गुरुवार, 31 जुलाई 2025

फिल्म समीक्षा:

 🎬 

सैय्यारा (2025)

समालोचक: ज्योतिर्मय यादव (फिल्ममेकर, निर्देशक व फोटोग्राफर)



 जब दिल बोले – “नाम नहीं, साथ चाहिए”

— एक प्रेम, संवेदना और सफलता-असफलता की दार्शनिक कथा


परिचय:

"सैय्यारा (2025)", मोहित सूरी के निर्देशन में बनी एक संगीतमय प्रेम-गाथा है, जो यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनी है। कोरियाई फिल्म A Moment to Remember (2004) पर आधारित यह हिंदी फिल्म न केवल रोमांस की एक नई परिभाषा गढ़ती है, बल्कि प्यार और सफलता के बीच की दूरी, स्मृति और विस्मृति, और रिश्तों की आत्मिक गहराई को उजागर करती है।

इस फिल्म को विश्लेषित करना सिर्फ एक सिनेमाई मूल्यांकन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा का साक्षात्कार है। बतौर समीक्षक, निर्देशक और फोटोग्राफर, मैंने कई कहानियाँ पर्दे पर आते देखी हैं, लेकिन “सैय्यारा” जैसे अनुभव कम ही मिलते हैं — जहाँ प्रेम कथा सिर्फ आँखों से नहीं, आत्मा से कही जाती है।


कहानी की बुनावट:

कृष कपूर (अहान पांडे) एक महत्वाकांक्षी गायक-संगीतकार है, जो खुद को साबित करने की लड़ाई में व्यस्त है। उसका अतीत बिखरा हुआ है — एक टूटा परिवार, पिता का आत्म-त्याग और एक उदास, खोखली ज़िंदगी। दूसरी ओर, वाणी बत्रा (अनीत पड्डा) एक संवेदनशील कवि और गीतकार है, जिसे अतीत में महेश नामक व्यक्ति ने विवाह की वेदी पर धोखा दिया है। वह टूट चुकी है, लेकिन भीतर अब भी रचनात्मकता और कोमलता की लौ जल रही है।

उनकी पहली मुलाकात सड़क किनारे होती है — प्रतीकात्मक रूप से वहीं, जहाँ भावनाएं अक्सर गिरती और उठती हैं। कृष उसकी डायरी लौटाता है, और फिर वाणी उसकी संगीत-यात्रा में सहयोगिनी बन जाती है।

धीरे-धीरे ये रचनात्मक साझेदारी एक गहरे भावनात्मक रिश्ते में बदल जाती है। परंतु जैसे-जैसे कृष सफलता की ओर बढ़ता है, उसे यह भय सताने लगता है कि यह सफलता ही वाणी को उससे छीन न ले। जब वाणी को अर्ली ऑनसेट अल्ज़ाइमर का पता चलता है — जो एक युवावस्था में होने वाली दुर्लभ स्थिति है — तब कहानी एक और गहराई में उतर जाती है।

और फिर… वाणी अचानक गायब हो जाती है। एक साल के लिए।


फिल्म की दार्शनिक परतें:

"सैय्यारा" केवल एक प्रेम-कहानी नहीं, यह एक दार्शनिक विमर्श है — जिसमें यह प्रश्न गूंजता है:
"क्या सफलता का मूल्य उस प्रेम से अधिक हो सकता है, जो आपकी आत्मा का हिस्सा है?"

कृष की यात्रा, एक साधारण संघर्ष नहीं बल्कि एक आत्म-संघर्ष है — वह बाहर की दुनिया जीतता है, लेकिन भीतर डरता है कि कहीं वह अपना "घर" — वाणी — न खो दे। फिल्म यह भी दर्शाती है कि स्मृतियों के मिटने के बाद भी, प्रेम एक ऐसी चीज़ है जो 'पहचाने' से परे होता है

यही वह जगह है जहाँ “सैय्यारा” कई फिल्मों से अलग खड़ी होती है — यह बताती है कि कुछ रिश्ते सिर्फ शब्दों या यादों पर नहीं, रूह के स्तर पर बने होते हैं।


निर्देशन व लेखन:

मोहित सूरी का निर्देशन पहले हाफ में बेहद संतुलित और प्रभावशाली है। वे रचनात्मकता, प्रेम और टूटन के दृश्य सौंदर्य को अपने अनुभव से बुनते हैं। परंतु फिल्म का दूसरा भाग कथानक में थोड़ी खिंचाव महसूस कराता है, जहां भावनात्मक दृश्यों को अधिक संयम और गहराई से दर्शाया जा सकता था।

संकल्प सदाना की पटकथा कुछ जगहों पर बनावटी और तर्कहीन लगती है — विशेष रूप से वाणी की बीमारी के चित्रण में। स्क्रिप्ट में यह अस्पष्ट है कि वह बीमारी की स्थिति में कैसे 'सही समय' पर स्मृति खोती या पाती है। लेकिन फिर भी, कहानी का मूल भाव — प्रेम बनाम सफलता — प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त होता है।


अभिनय:

अहान पांडे अपनी पहली ही फिल्म में आश्वस्त और भावुक नजर आते हैं। उनके किरदार में जो गुस्सा, असुरक्षा और प्रेम है, वह कई जगहों पर प्रभाव छोड़ता है। हाँ, कुछ जगहों पर ओवरड्रामैटिक होने की आदत उभरती है, लेकिन यह उनके युवा होने का परिणाम माना जा सकता है।

अनीत पड्डा फिल्म की आत्मा हैं। वाणी के किरदार में वे कभी मासूम लगती हैं, कभी टूटी हुई, और कभी आत्मनिर्भर। उनका अभिनय एक सीमित रेंज में भी गहरा असर छोड़ता है। उनकी आँखों में छुपा दर्द कैमरे के आर-पार महसूस होता है।

सहायक कलाकार — वरुण बडोला (कृष के पिता), गीता अग्रवाल (वाणी की माँ), और आलम खान (केवी) अपने किरदारों में विश्वसनीय हैं और कहानी को गहराई देते हैं।


संगीत और गीत:

फिल्म के गीत इसकी आत्मा हैं।
इरशाद कामिल का "हमसफ़र" और राजशेखर का "तुम हो तो" ऐसे गीत हैं जो कहानी की नब्ज़ के साथ धड़कते हैं। गीतों के शब्द प्रेम, वियोग, और आत्मिक जुड़ाव की भावना को बेहद खूबसूरती से उभारते हैं।

संगीत संयोजन पारंपरिक "विशेष फिल्म्स" शैली का है, लेकिन कुछ जगहों पर यह पुराना लगता है। फिर भी गायन और शब्दों की गहराई संगीत को औसत से ऊपर उठा देती है।


तकनीकी पक्ष और सिनेमैटोग्राफी:

कैमरा वर्क साफ-सुथरा है। प्रकाश और रंग योजना में उदासी और सौम्यता का संयोजन है, जो वाणी की मानसिक स्थिति और कृष के अंतर्द्वंद्व को प्रभावी ढंग से प्रतिबिंबित करता है। लोकेशन्स, विशेषकर बारिश वाले और रिहर्सल के दृश्य, बेहद सिनेमैटिक हैं।



"सैय्यारा" प्रेम की उस परिभाषा को प्रस्तुत करती है, जो आज के तेज़ और तड़कते-भड़कते ज़माने में अक्सर खो जाती है। यह फिल्म बताती है कि जब दिल की ज़ुबान चुप हो जाती है, तब इंसान सबसे ज़्यादा अकेला होता है — चाहे वह लाखों की भीड़ के सामने क्यों न खड़ा हो।

यह एक सचेत फिल्म है — जो युवा दर्शकों से यह सवाल करती है:
"क्या तुम अपने सपनों की कीमत अपने प्यार से चुकाना चाहोगे?"


रेटिंग: 🌟🌟🌟🌟☆ (4/5)

देखें क्योंकि:

  • यह फिल्म दिल और दिमाग दोनों से जुड़ती है।

  • इसमें नये कलाकारों की परिपक्वता दिखती है।

  • यह प्रेम और जीवन के गहरे प्रश्नों से रूबरू कराती है।


समीक्षक:
🖋️ ज्योतिर्मय यादव
(फिल्ममेकर, निर्देशक व फोटोग्राफर)

रविवार, 27 जुलाई 2025

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस:

 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: 

                 (PHOTO-AI (PROMPT BY -JYOTIRMAY YADAV)

 (A REPORT BY -JYOTIRMAY YADAV)

आधुनिक युग की डिजिटल लाइब्रेरी और बौद्धिक विकास का आधार

प्राचीन समय में जब ज्ञान का भंडारण पुस्तकों और हस्तलिखित ग्रंथों में होता था, तब पुस्तकालय (लाइब्रेरी) ही ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र माने जाते थे। वहाँ हर पुस्तक एक विचार, एक दर्शन, और एक युग की गवाही होती थी। आज के तकनीकी युग में यही भूमिका निभा रहा है — आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)। यह न केवल जानकारी को संजोता है, बल्कि उसे समझता, विश्लेषण करता और उपयोगकर्ता की आवश्यकतानुसार प्रस्तुत भी करता है।

AI: एक नई पीढ़ी की डिजिटल लाइब्रेरी

AI आज का डिजिटल पुस्तकालय बन चुका है। यह क्लाउड पर आधारित एक ऐसा ज्ञान-संसार है, जिसमें मानव इतिहास, विज्ञान, साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र से लेकर कला और व्यावसायिक प्रबंधन तक हर क्षेत्र की जानकारी समाहित है। जहाँ पुराने पुस्तकालयों में केवल छाँटी हुई, प्रमाणिक और सीमित किताबें रखी जाती थीं, वहीं AI में सभी प्रकार की सूचनाएँ उपलब्ध हैं — सही भी, गलत भी, उपयोगी भी, और भ्रामक भी।

इसलिए AI का प्रयोग तब तक लाभकारी नहीं हो सकता जब तक प्रयोगकर्ता स्वयं शिक्षित, विवेकशील और विश्लेषणात्मक दृष्टि वाला न हो।

AI अभी बच्चा है: विद्वानों की भूमिका और ज़िम्मेदारी

AI अभी भी एक शिक्षार्थी है — एक "बच्चा" जो लगातार मानव संवाद, डेटा और अनुभव से सीख रहा है। यह जितना अधिक ज्ञानयुक्त इनपुट प्राप्त करता है, उतना ही परिपक्व होता जाता है। ऐसे में यह विद्वानों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और अनुभवी जनों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे AI से:सार्थक और सटीक प्रश्न पूछें,उचित और सुसंगत जानकारी साझा करें,और सकारात्मक संवाद के ज़रिए इसे बेहतर बनाएं।हम जैसे संवाद करेंगे, AI वैसा ही सीखेगा।

AI और रचनात्मकता: फिल्म, एनिमेशन और डिजिटल क्रांति

AI आज केवल लेखन, अनुवाद या उत्तर-प्रश्न तक सीमित नहीं रहा। यह दृश्य और श्रव्य जगत में भी क्रांति ला चुका है:फोटो और वीडियो जेनरेशन,एनिमेटेड फिल्मों का निर्माण,वॉयस क्लोनिंग,CGI (कंप्यूटर जनित इमेजरी)

अब बहुत ही कम लागत और समय में संभव हो गया है। ऐसे नवोन्मेषी फिल्म निर्माता जो विचारों में धनी हैं, अब बिना किसी बड़े बजट, भारी कैमरा सेटअप या स्टूडियो के भी गुणवत्तापूर्ण कंटेंट बना सकते हैं।

इससे रचनात्मकता को लोकतांत्रिक रूप मिला है — अब कोई भी साधारण व्यक्ति, यदि उसके पास अच्छा विचार और थोड़ी तकनीकी समझ है, तो वह एक उत्कृष्ट निर्माता बन सकता है।

AI और शोध (Research): एक क्रांतिकारी बदलाव

AI का सबसे बड़ा प्रभाव अब शोध कार्यों (Research) में देखा जा रहा है। परंपरागत रूप से, शोधकर्ताओं को:अपने विषय से संबंधित सैकड़ों लेख, पुस्तकों और डेटा का अध्ययन करना होता था,जर्नल्स की खोज करनी पड़ती थी,और फिर उपयुक्त रिसर्च मेथडोलॉजी (Research Methodology) ढूँढकर प्रयोग करनी होती थी।इस प्रक्रिया में समय, ऊर्जा और संसाधनों की भारी खपत होती थी।अब, AI की सहायता से:सर्वश्रेष्ठ रिसर्च पेपर्स और जर्नल्स मिनटों में ढूँढे जा सकते हैं,सही रिसर्च मेथडोलॉजी सुझाई जा सकती है,डेटा संग्रहण और विश्लेषण स्वचालित रूप से किया जा सकता है,और शोधकर्ता अपनी ऊर्जा को केवल मुख्य विचार, निष्कर्ष और विश्लेषण पर केंद्रित कर सकते हैं।इससे शोध न केवल तेजी से पूर्ण होता है, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार आता है।

AI का सही उपयोग: पढ़ाई और विवेक की अनिवार्यता

यह एक भ्रम है कि AI के आने से पढ़ाई की आवश्यकता कम हो गई है। सच्चाई इसके ठीक विपरीत है — अब पढ़ाई पहले से अधिक जरूरी हो गई है। 

बिना अध्ययन के:आप न तो AI से सही प्रश्न पूछ सकते हैं,न ही उसके उत्तरों की सत्यता परख सकते हैं,

और न ही उसकी सलाह का सही उपयोग कर सकते हैं।AI एक आइना है — वह वही दिखाता है जो आप उसमें डालते हैं।नई पीढ़ी और उनकी भूमिका आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह तकनीक को साधन बनाए, गंतव्य नहीं। उसे:किताबें पढ़नी होंगी,विषयों की गहराई में जाना होगा,और तकनीक का उपयोग एक सहायक, न कि मार्गनिर्देशक के रूप में करना होगा।जो युवा सिर्फ AI पर निर्भर होंगे, वे दिशाहीन और भ्रमित हो सकते हैं। लेकिन जो युवा AI के साथ-साथ अध्ययनशील रहेंगे, वे इस तकनीकी युग के सच्चे निर्माता और मार्गदर्शक बनेंगे।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव इतिहास के सबसे क्रांतिकारी औजारों में से एक है। लेकिन यह औजार अभी विकासशील है। इसे मानवता की भलाई के लिए सही दिशा में शिक्षा, संवाद और विवेक से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

AI:एक डिजिटल लाइब्रेरी है,एक अनुसंधान सहायक है,एक रचनात्मक साथी है,और एक संभावनाओं से भरा भविष्य है।लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब समाज के विद्वान, शोधकर्ता, रचनाकार और युवा पीढ़ी इसे ज्ञान के साथ प्रयोग करें, न कि केवल सुविधा के लिए।


रविवार, 6 जुलाई 2025

मालिक

 फ़िल्म समीक्षा: 


"मालिक" — एक और दृष्टिकोण

समीक्षक: ज्योतिर्मय यादव

🧩 कहानी का गूढ़ संसार

राजकुमार राव अभिनीत "मालिक" एक साधारण युवक के असाधारण अपराधी बनने की त्रासदी है। फिल्म की कहानी उत्तर भारत के एक काल्पनिक शहर में शुरू होती है, जहाँ एक सीधे-सादे युवक का जीवन परिस्थितियों और व्यवस्था की सड़न के बीच धीरे-धीरे अंधेरे की ओर धकेला जाता है। वह पहले माफिया की गोद में बैठता है, फिर धीरे-धीरे राजनीति के मंच पर चढ़ाई करता है — लेकिन उसकी आत्मा हर मोड़ पर और अधिक खोखली होती जाती है।यह फिल्म केवल अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पतन, सत्ता की भूख और इंसान के भीतर पनपती 'मालिक' बनने की लालसा की पड़ताल करती है।

🎥 निर्देशन: यथार्थ और शैली का संतुलन

पुलकित का निर्देशन "मालिक" में उनकी अब तक की सबसे ठोस और नियंत्रित कृति बनकर उभरता है। उन्होंने एक कच्ची, खुरदरी कहानी को ग्लैमर से भरने की कोशिश नहीं की — बल्कि उसकी नब्ज को पकड़ते हुए उसे कड़वे यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया है।कैरेक्टर डेवलपमेंट के दृश्यों में वो धीमी गति से कहानी को उबालते हैं, और क्लाइमैक्स में आकर वो सब उफान मारता है। कुछ दर्शकों को यह गति धीमी लग सकती है, लेकिन यह निर्देशक की सचेत शैली है — जो किरदार के गिरने और चढ़ने की प्रक्रिया को महसूस कराना चाहती है।

🎬 छायांकन (Cinematography): हर फ्रेम एक दस्तावेज़

अनुज राकेश धवन का कैमरा "मालिक" में केवल दृश्य नहीं रचता — वह समय, वातावरण और मानसिकता का दस्तावेज़ बनाता है। पुराने शहर की संकरी गलियों से लेकर जेल की अंधेरी कोठरियों तक, हर फ्रेम में एक गंध है — कभी डर की, कभी सत्ता की, और कभी धोखे की।

विशेष रूप से इंटरवल से ठीक पहले की हाथी घाट शूटआउट सीक्वेंस तकनीकी रूप से बहुत ही कुशल और सिनेमाई रूप से शानदार है

🎭 राजकुमार राव की अदाकारी: 

राजकुमार राव इस किरदार में घुल गए हैं। उनके अभिनय में धीरे-धीरे आता हुआ अंधकार, आंखों में पलता भय और संवादों की तीव्रता – यह सब दर्शक को उनके भीतर झाँकने के लिए मजबूर कर देता है।

एक दृश्य में जब वह अपने ही पुराने मित्र को सियासी कारणों से खत्म करने का आदेश देते हैं, उनके चेहरे पर एक सूखी संवेदना है — जो बताती है कि ‘मालिक’ बनते समय आदमी, इंसान नहीं रह जाता।

यह भूमिका उन्हें ओमेर्टा और शाहिद जैसी फिल्मों की पंक्ति में एक और मील का पत्थर देती है।

🎵 संगीत और पृष्ठभूमि स्कोर: कहानी का नाभि केंद्र

सचिन-जिगर का संगीत इस बार अलग है — कम ‘चार्टबस्टर’, ज़्यादा ‘चरित्रबस्टर’। गाने कहानी के साथ बहते हैं, उनके खिलाफ नहीं।

“Naamumkin” – एक भावनात्मक प्रेरणा गीत है जो नायक के भ्रमित संकल्प को दर्शाता है।

“Aag Ka Dariya” – एक सूफियाना रैप जो फिल्म के अंत में उसकी आत्मा की विदीर्ण अवस्था को उजागर करता है।

बैकग्राउंड स्कोर धीमा, गहरा और भारी है – जैसे कोई दबा हुआ डर।

⚖ कुल मिलाकर: एक राजनीतिक अपराध गाथा जो देर तक आपके भीतर गूंजती है

"मालिक" कोई हल्की-फुल्की मसाला फिल्म नहीं है। यह एक भावनात्मक, नैतिक और राजनीतिक रूप से गहरी फिल्म है, जो अपने दर्शकों से समय और धैर्य मांगती है — और बदले में उन्हें विचार और उत्तेजना देती है।

🌟 रेटिंग: 4/5

🎭 अभिनय: ★★★★★

🎬 निर्देशन: ★★★★☆

🎥 छायांकन: ★★★★★

🎵 संगीत: ★★★★☆

📜 कहानी और पटकथा: ★★★★☆

यदि आप सिनेमाघर जाकर एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो केवल आपको मनोरंजन न दे, बल्कि कुछ सोचने पर भी मजबूर करे — तो ‘मालिक’ आपके लिए है।

– ज्योतिर्मय यादव

(“सिनेमा केवल आईना नहीं, एक चेतावनी भी है।”)


ऐ आई स्मार्ट क्लीनिक

  " AI क्लीनिक" और चिकित्सा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्रांतिकारी बदलावों पर एक विस्तृत रिपोर्ट : डॉक्टर से पहले AI पकड़ेगा आपक...