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सैय्यारा (2025)
समालोचक: ज्योतिर्मय यादव (फिल्ममेकर, निर्देशक व फोटोग्राफर)
जब दिल बोले – “नाम नहीं, साथ चाहिए”
— एक प्रेम, संवेदना और सफलता-असफलता की दार्शनिक कथा
परिचय:
"सैय्यारा (2025)", मोहित सूरी के निर्देशन में बनी एक संगीतमय प्रेम-गाथा है, जो यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनी है। कोरियाई फिल्म A Moment to Remember (2004) पर आधारित यह हिंदी फिल्म न केवल रोमांस की एक नई परिभाषा गढ़ती है, बल्कि प्यार और सफलता के बीच की दूरी, स्मृति और विस्मृति, और रिश्तों की आत्मिक गहराई को उजागर करती है।
इस फिल्म को विश्लेषित करना सिर्फ एक सिनेमाई मूल्यांकन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा का साक्षात्कार है। बतौर समीक्षक, निर्देशक और फोटोग्राफर, मैंने कई कहानियाँ पर्दे पर आते देखी हैं, लेकिन “सैय्यारा” जैसे अनुभव कम ही मिलते हैं — जहाँ प्रेम कथा सिर्फ आँखों से नहीं, आत्मा से कही जाती है।
कहानी की बुनावट:
कृष कपूर (अहान पांडे) एक महत्वाकांक्षी गायक-संगीतकार है, जो खुद को साबित करने की लड़ाई में व्यस्त है। उसका अतीत बिखरा हुआ है — एक टूटा परिवार, पिता का आत्म-त्याग और एक उदास, खोखली ज़िंदगी। दूसरी ओर, वाणी बत्रा (अनीत पड्डा) एक संवेदनशील कवि और गीतकार है, जिसे अतीत में महेश नामक व्यक्ति ने विवाह की वेदी पर धोखा दिया है। वह टूट चुकी है, लेकिन भीतर अब भी रचनात्मकता और कोमलता की लौ जल रही है।
उनकी पहली मुलाकात सड़क किनारे होती है — प्रतीकात्मक रूप से वहीं, जहाँ भावनाएं अक्सर गिरती और उठती हैं। कृष उसकी डायरी लौटाता है, और फिर वाणी उसकी संगीत-यात्रा में सहयोगिनी बन जाती है।
धीरे-धीरे ये रचनात्मक साझेदारी एक गहरे भावनात्मक रिश्ते में बदल जाती है। परंतु जैसे-जैसे कृष सफलता की ओर बढ़ता है, उसे यह भय सताने लगता है कि यह सफलता ही वाणी को उससे छीन न ले। जब वाणी को अर्ली ऑनसेट अल्ज़ाइमर का पता चलता है — जो एक युवावस्था में होने वाली दुर्लभ स्थिति है — तब कहानी एक और गहराई में उतर जाती है।
और फिर… वाणी अचानक गायब हो जाती है। एक साल के लिए।
फिल्म की दार्शनिक परतें:
"सैय्यारा" केवल एक प्रेम-कहानी नहीं, यह एक दार्शनिक विमर्श है — जिसमें यह प्रश्न गूंजता है:
"क्या सफलता का मूल्य उस प्रेम से अधिक हो सकता है, जो आपकी आत्मा का हिस्सा है?"
कृष की यात्रा, एक साधारण संघर्ष नहीं बल्कि एक आत्म-संघर्ष है — वह बाहर की दुनिया जीतता है, लेकिन भीतर डरता है कि कहीं वह अपना "घर" — वाणी — न खो दे। फिल्म यह भी दर्शाती है कि स्मृतियों के मिटने के बाद भी, प्रेम एक ऐसी चीज़ है जो 'पहचाने' से परे होता है।
यही वह जगह है जहाँ “सैय्यारा” कई फिल्मों से अलग खड़ी होती है — यह बताती है कि कुछ रिश्ते सिर्फ शब्दों या यादों पर नहीं, रूह के स्तर पर बने होते हैं।
निर्देशन व लेखन:
मोहित सूरी का निर्देशन पहले हाफ में बेहद संतुलित और प्रभावशाली है। वे रचनात्मकता, प्रेम और टूटन के दृश्य सौंदर्य को अपने अनुभव से बुनते हैं। परंतु फिल्म का दूसरा भाग कथानक में थोड़ी खिंचाव महसूस कराता है, जहां भावनात्मक दृश्यों को अधिक संयम और गहराई से दर्शाया जा सकता था।
संकल्प सदाना की पटकथा कुछ जगहों पर बनावटी और तर्कहीन लगती है — विशेष रूप से वाणी की बीमारी के चित्रण में। स्क्रिप्ट में यह अस्पष्ट है कि वह बीमारी की स्थिति में कैसे 'सही समय' पर स्मृति खोती या पाती है। लेकिन फिर भी, कहानी का मूल भाव — प्रेम बनाम सफलता — प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त होता है।
अभिनय:
अहान पांडे अपनी पहली ही फिल्म में आश्वस्त और भावुक नजर आते हैं। उनके किरदार में जो गुस्सा, असुरक्षा और प्रेम है, वह कई जगहों पर प्रभाव छोड़ता है। हाँ, कुछ जगहों पर ओवरड्रामैटिक होने की आदत उभरती है, लेकिन यह उनके युवा होने का परिणाम माना जा सकता है।
अनीत पड्डा फिल्म की आत्मा हैं। वाणी के किरदार में वे कभी मासूम लगती हैं, कभी टूटी हुई, और कभी आत्मनिर्भर। उनका अभिनय एक सीमित रेंज में भी गहरा असर छोड़ता है। उनकी आँखों में छुपा दर्द कैमरे के आर-पार महसूस होता है।
सहायक कलाकार — वरुण बडोला (कृष के पिता), गीता अग्रवाल (वाणी की माँ), और आलम खान (केवी) अपने किरदारों में विश्वसनीय हैं और कहानी को गहराई देते हैं।
संगीत और गीत:
संगीत संयोजन पारंपरिक "विशेष फिल्म्स" शैली का है, लेकिन कुछ जगहों पर यह पुराना लगता है। फिर भी गायन और शब्दों की गहराई संगीत को औसत से ऊपर उठा देती है।
तकनीकी पक्ष और सिनेमैटोग्राफी:
कैमरा वर्क साफ-सुथरा है। प्रकाश और रंग योजना में उदासी और सौम्यता का संयोजन है, जो वाणी की मानसिक स्थिति और कृष के अंतर्द्वंद्व को प्रभावी ढंग से प्रतिबिंबित करता है। लोकेशन्स, विशेषकर बारिश वाले और रिहर्सल के दृश्य, बेहद सिनेमैटिक हैं।
"सैय्यारा" प्रेम की उस परिभाषा को प्रस्तुत करती है, जो आज के तेज़ और तड़कते-भड़कते ज़माने में अक्सर खो जाती है। यह फिल्म बताती है कि जब दिल की ज़ुबान चुप हो जाती है, तब इंसान सबसे ज़्यादा अकेला होता है — चाहे वह लाखों की भीड़ के सामने क्यों न खड़ा हो।
रेटिंग: 🌟🌟🌟🌟☆ (4/5)
देखें क्योंकि:
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यह फिल्म दिल और दिमाग दोनों से जुड़ती है।
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इसमें नये कलाकारों की परिपक्वता दिखती है।
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यह प्रेम और जीवन के गहरे प्रश्नों से रूबरू कराती है।
समीक्षक:
🖋️ ज्योतिर्मय यादव
(फिल्ममेकर, निर्देशक व फोटोग्राफर)


