त्योहार/परम्परा
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026
प्रशासनिक सेवा से साहित्य साधना तक का प्रेरक सफर
10 अक्टूबर को लखनऊ के बलरामपुर गार्डन में होगा भव्य सम्मान समारोह, साहित्यिक योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर होंगे सम्मानित
लखनऊ। उत्तर प्रदेश शासन के पूर्व विशेष सचिव एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम नारायण यादव को उनके विशिष्ट साहित्यिक योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट (रजि.) के संस्थापक एवं अध्यक्ष श्री मोहन मुरारी शर्मा ने इस सम्मान की घोषणा की है। आगामी 10 अक्टूबर 2026 को लखनऊ के बलरामपुर गार्डन में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं पुस्तक मेले के मुख्य मंच पर यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। कार्यक्रम का आयोजन विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट एवं निखिल प्रकाशन समूह, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।
प्रशासनिक सेवा से साहित्य साधना तक का प्रेरक सफर
प्रशासनिक सेवा में विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश शासन जैसे महत्वपूर्ण पद पर अपनी सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त हुए प्रेम नारायण यादव ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। उनकी साहित्यिक यात्रा संवेदना, चिंतन, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। गीत, गजल, अध्यात्म और लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत जैसे विविध विषयों पर उनकी लेखनी ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है।
उनकी रचनाओं में जीवन के सुख-दुख, प्रेम, मानवीय संवेदनाएं, प्रकृति की सुंदरता और आध्यात्मिक चिंतन सहज रूप से अभिव्यक्त होते हैं। साहित्य के प्रति उनकी निरंतर साधना इस बात का प्रमाण है कि रचनात्मकता किसी पद या आयु की मोहताज नहीं होती, बल्कि जीवन के अनुभवों के साथ और अधिक परिपक्व होती जाती है।
पाँच प्रमुख कृतियां हैं साहित्यिक पहचान का आधार
प्रेम नारायण यादव की पांच चर्चित कृतियां उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के विविध आयामों को सामने लाती हैं।
‘इसलिए गीत गाता हूँ मैं’ गीत-गजल संग्रह में जीवन के संघर्षों, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति है। वहीं ‘क्या रंग रोशनी है..’ में प्रकृति, अंतर्मन की उजास और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का सुंदर चित्रण मिलता है।
उनका एक अन्य गीत-गजल संग्रह ‘दिल की कलम से’ मानवीय भावनाओं और जीवन के अनुभवों को सहज एवं प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करता है। आध्यात्मिक चिंतन के क्षेत्र में उनकी कृति ‘श्रीमद् भगवद्गीता – अमृतम् महत्’ विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें गीता के गूढ़ संदेशों को सरल, रोचक और नवीन दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
इसके अतिरिक्त ‘ख़याल गंज नख़लऊ’ लखनऊ के ऐतिहासिक वैभव, नवाबी संस्कृति, नजाकत और तहजीब को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करती है। यह कृति शहर की सांस्कृतिक पहचान और उसकी समृद्ध विरासत से पाठकों को जोड़ने का माध्यम बनती है।
राष्ट्रीय साहित्यिक आयोजन में जुटेंगे साहित्यकार
विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री मोहन मुरारी शर्मा के अनुसार, सम्मान समारोह का निर्धारित समय दोपहर 12:30 बजे से शाम 4:00 बजे तक रहेगा। इस अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं पुस्तक मेले के मंच पर देश के विभिन्न हिस्सों से साहित्यकारों, प्रकाशकों और साहित्यप्रेमियों के शामिल होने की अपेक्षा है।
‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’ से प्रेम नारायण यादव को विभूषित किया जाना उनके साहित्यिक अवदान के प्रति सम्मान और हिंदी भाषा-साहित्य की समृद्ध परंपरा के प्रति गौरव का अवसर होगा। यह आयोजन साहित्य, संस्कृति और पुस्तकों के प्रति अनुराग रखने वाले लोगों को एक साझा मंच प्रदान करेगा।
आयोजकों ने साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, पुस्तक प्रेमियों और आम नागरिकों से इस साहित्यिक आयोजन में सहभागिता करने की अपील की है।
वैश्विक स्तर पर शोध उत्कृष्टता की निरंतर पहचान
AKTU के डॉ. अनुज कुमार शर्मा ने विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों की सूची में लगातार छठी बार बनाई जगह
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और एल्सेवियर की वैश्विक सूची में मिली पहचान, शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान से बढ़ाया विश्वविद्यालय का गौरव
लखनऊ। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय (AKTU), लखनऊ के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनुज कुमार शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और एल्सेवियर द्वारा 7 अक्टूबर 2026 को जारी World’s Top 2% Scientists List 2026 में उन्हें स्थान मिला है। इसके साथ ही डॉ. शर्मा ने वर्ष 2021 से लगातार छठी बार इस प्रतिष्ठित वैश्विक सूची में अपनी जगह बनाई है। उनकी यह उपलब्धि अनुसंधान, नवाचार और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उनके निरंतर योगदान को रेखांकित करती है। इसी सूची में इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (IET) के प्रो. अरुण कुमार तिवारी भी शामिल हैं।
वैश्विक स्तर पर शोध उत्कृष्टता की निरंतर पहचान
विश्व के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में लगातार छह वर्षों तक स्थान प्राप्त करना डॉ. शर्मा की दीर्घकालिक शोध प्रतिबद्धता और अकादमिक सक्रियता को दर्शाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में जारी सूची में भारत के 6,239 वैज्ञानिक शामिल थे, जबकि वर्ष 2026 की सूची में देश के 3,858 वैज्ञानिकों को स्थान मिला। ऐसे प्रतिस्पर्धी वैश्विक अकादमिक परिदृश्य में डॉ. शर्मा की निरंतर उपस्थिति उनके शोध कार्यों की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को रेखांकित करती है।
अकादमिक नेतृत्व और नवाचार में भी निभा रहे महत्वपूर्ण भूमिका
डॉ. अनुज कुमार शर्मा वर्तमान में एकेटीयू में डीन, एकेडमिक्स तथा मेकाट्रॉनिक्स विभागाध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इसके साथ ही वे नवाचार, सामाजिक उद्यमिता, अनुसंधान और औद्योगिक परामर्श से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। वह एकेटीयू फाउंडेशन के अंतर्गत कलाम सेंटर फॉर इनोवेशन एंड इन्क्यूबेशन ऑफ स्टार्टअप के निदेशक के रूप में भी कार्यरत हैं। उनके प्रयासों का उद्देश्य शोध को व्यावहारिक उपयोग, तकनीकी विकास और स्टार्टअप नवाचार से जोड़ना है।
डॉ. शर्मा ने वर्ष 2017 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएसएम), धनबाद से मशीनिंग विषय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनके प्रमुख शोध क्षेत्रों में मेटल कटिंग, इलेक्ट्रिकल डिस्चार्ज मशीनिंग, मशीनिंग ट्राइबोलॉजी, नैनो-कटिंग फ्लुइड्स, सॉफ्ट रोबोटिक्स, बायो-इंस्पायर्ड रोबोटिक्स और मेकाट्रॉनिक्स सिस्टम शामिल हैं।
135 से अधिक शोध पत्र और छह पेटेंट
अनुसंधान एवं तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में डॉ. शर्मा का योगदान उल्लेखनीय है। उनके नाम 135 से अधिक SCIE एवं Scopus इंडेक्स्ड शोध पत्र और छह पेटेंट दर्ज हैं। उन्होंने प्रधान अन्वेषक के रूप में छह शोध परियोजनाओं का नेतृत्व किया है, जिनकी कुल राशि चार करोड़ रुपये से अधिक है।
इन शोध परियोजनाओं को भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के SERB, उत्तर प्रदेश सरकार की काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (CST) तथा अन्य संस्थानों से वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धियां उनके शोध कार्यों की व्यापकता और विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों में योगदान को दर्शाती हैं।
अकादमिक उत्कृष्टता के लिए मिल चुके हैं कई सम्मान
डॉ. शर्मा को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल द्वारा अकादमिक एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, एकेटीयू ने उन्हें वर्ष 2020 और 2025 में बेस्ट टीचर अवार्ड प्रदान किया। कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने सुरक्षा एवं बचाव से संबंधित उपयोगी उत्पादों के विकास में भी योगदान दिया।
एकेटीयू के लिए गौरव, युवा शोधार्थियों के लिए प्रेरणा
वर्ष 2021 से लगातार विश्व के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में स्थान प्राप्त करना डॉ. अनुज कुमार शर्मा की शोध के प्रति प्रतिबद्धता, अकादमिक उत्कृष्टता और नवाचार की दिशा में निरंतर प्रयासों का परिचायक है। उनकी यह उपलब्धि एकेटीयू के लिए गौरव का विषय है। साथ ही, यह युवा शोधार्थियों, विद्यार्थियों और शिक्षकों को विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा नवाचार के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।
शुक्रवार, 21 अगस्त 2026
आवारापन 2
आवारापन 2- अपराध के अंधेरे में इंसानियत की तलाश
"कुछ फिल्में केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनतीं, बल्कि वे समाज और इंसान के भीतर छिपी उन सच्चाइयों को सामने लाती हैं, जिन पर हम अक्सर बात नहीं करना चाहते। ‘आवारापन 2’ भी ऐसी ही फिल्म है। इसे सिर्फ एक एक्शन या गैंगस्टर फिल्म मानना इसके वास्तविक भावनात्मक और सामाजिक पक्ष को सीमित कर देना होगा। फिल्म अपराध की दुनिया के साथ-साथ रिश्तों, संवेदनाओं, पारिवारिक विघटन और पीढ़ियों तक चलने वाली मानसिकता की एक गंभीर तस्वीर पेश करती है।" --समीक्षक — ज्योतिर्मय यादव, फोटोग्राफर एवं कंटेंट क्रिएटर
निर्देशन और निर्माण
मोहित सूरी का निर्देशन फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में से एक है। उन्होंने अपराध और एक्शन के बीच एक ऐसे व्यक्ति की भावनात्मक यात्रा को रखा है, जिसके भीतर प्यार, पछतावा और इंसानियत अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। शिवम का किरदार जितना बाहर से कठोर है, भीतर से उतना ही टूटा हुआ दिखाई देता है। मोहित सूरी ने इस आंतरिक द्वंद्व को कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
मुकेश भट्ट और विशेष फिल्म्स का निर्माण उस दौर की फिल्मों के अनुरूप कहानी को एक गहरे, अंधेरे और भावनात्मक माहौल में प्रस्तुत करता है। फिल्म का संसार चमकदार नहीं है, बल्कि किरदारों की जिंदगी के दर्द और अपराध की कठोरता को सामने रखता है।
लेखन
शगुप्ता रफीक का लेखन फिल्म की वास्तविक ताकत है। कहानी केवल एक गैंगस्टर की जिंदगी नहीं बताती, बल्कि यह सवाल उठाती है कि अपराध और हिंसा किस तरह इंसान की संवेदनाओं को खत्म करते हैं। रिश्तों में जब भरोसा और संवेदना समाप्त होने लगती है, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे परिवार और आसपास के लोगों पर पड़ता है।
सिनेमैटोग्राफी
राज चक्रवर्ती की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के अंधेरे और गंभीर वातावरण को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि कुछ दृश्यों में कैमरा-वर्क दर्शकों के लिए असहज हो सकता है, लेकिन फिल्म के अपराध, अकेलेपन और तनावपूर्ण माहौल को दृश्यात्मक रूप देने में सिनेमैटोग्राफी का योगदान महत्वपूर्ण है।
संगीत
फिल्म का संगीत इसकी सबसे यादगार उपलब्धियों में से एक है। प्रीतम, राजू सिंह, एनी और मुस्तफा जाहिद से जुड़े संगीत ने फिल्म की भावनात्मक पहचान को मजबूत किया। ‘तो फिर आओ’, ‘तेरा मेरा रिश्ता’ और ‘माहिया’ जैसे गीत कहानी के दर्द, प्रेम और अकेलेपन को आवाज देते हैं। यही कारण है कि फिल्म के रिलीज होने के वर्षों बाद भी इसका संगीत दर्शकों की यादों में बना हुआ है।
प्रमुख किरदार
फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि संकीर्णता और अपराध की मानसिकता केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। कई बार वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाती है। परिवार में जिस वातावरण में हिंसा, बदला, नफरत, अपराध और गलत सोच को सामान्य मान लिया जाता है, वही सोच धीरे-धीरे अगली पीढ़ी के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। परिणाम यह होता है कि एक व्यक्ति की गलतियां धीरे-धीरे पूरे परिवार की नियति बन जाती हैं और अंततः पूरा परिवार तबाही के कगार पर पहुंच जाता है।
यही फिल्म का सबसे गहरा संदेश है—अपराध केवल कानून नहीं तोड़ता, वह रिश्तों को भी तोड़ता है। जब किसी व्यक्ति की जिंदगी में गैंगस्टर मानसिकता, हिंसा, नशा और अपराध हावी हो जाते हैं, तो सबसे पहले उसके भीतर की संवेदना कमजोर होती है। इसके बाद परिवार और करीबी रिश्तों के प्रति सम्मान तथा भावनात्मक जुड़ाव खत्म होने लगता है। इंसान अपने ही लोगों के दर्द को समझना बंद कर देता है।
फिल्म इसी सवाल को सामने रखती है कि आखिर एक गलत मानसिकता किस तरह पीढ़ियों को प्रभावित करती है? एक पिता या परिवार का अपराधी अतीत किस तरह बच्चों की सोच और भविष्य को प्रभावित कर सकता है? और जब अपराध को विरासत की तरह आगे बढ़ाया जाता है, तो क्या अगली पीढ़ी उस चक्र को तोड़ सकती है?
इसी वजह से फिल्म का भावनात्मक पक्ष काफी मजबूत दिखाई देता है। इसके किरदार केवल अच्छे और बुरे की सरल श्रेणियों में बंटे हुए नहीं हैं। उनके भीतर अपराध भी है, दर्द भी है, पछतावा भी है और कहीं न कहीं इंसानियत की तलाश भी है।
इस पूरी यात्रा में इमरान हाशमी का अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। इस बार वह अपने पुराने ‘किसिंग किंग’ वाले लोकप्रिय अंदाज से काफी अलग दिखाई देते हैं। उनका किरदार अधिक संयमित, गंभीर और संवेदनशील है। इमरान ने संवादों से ज्यादा अपनी आंखों, चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज के जरिए किरदार की आंतरिक पीड़ा को व्यक्त किया है।
उनके किरदार में एक अजीब-सा ठहराव है। वह बाहर से कठोर दिखाई देता है, लेकिन भीतर कहीं भावनाएं लगातार संघर्ष कर रही हैं। यही विरोधाभास उनके किरदार को दिलचस्प बनाता है। इमरान हाशमी ने इस भूमिका में यह साबित किया है कि उनकी अभिनय क्षमता केवल रोमांटिक या बोल्ड भूमिकाओं तक सीमित नहीं है।
फिल्म की कहानी में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान की संवेदनाएं उसके सबसे करीबी रिश्तों से जुड़ी होती हैं। लेकिन जब अपराध और नशे की मानसिकता उस संवेदना पर कब्जा कर लेती है, तो व्यक्ति उन्हीं लोगों को चोट पहुंचाने लगता है जिनके लिए उसे सबसे ज्यादा खड़ा होना चाहिए। परिवार धीरे-धीरे भावनात्मक रूप से टूटता है और एक समय ऐसा आता है जब साथ रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से अजनबी हो जाते हैं।
यही वह बिंदु है जहां ‘आवारापन 2’ केवल गैंगस्टर कहानी नहीं रह जाती, बल्कि परिवार और समाज के लिए एक चेतावनी बन जाती है।
फिल्म की एक बड़ी कमजोरी इसकी सिनेमैटोग्राफी है। विशेषकर इंटरवल से पहले तक कैमरा-वर्क और विजुअल ट्रीटमेंट कई जगह आंखों को परेशान करता है। इतनी गंभीर और भावनात्मक कहानी के लिए जिस तरह की दृश्यात्मक सहजता और सिनेमाई खूबसूरती की उम्मीद होती है, वह शुरुआती हिस्से में पूरी तरह दिखाई नहीं देती। कई दृश्यों में कैमरा कहानी की भावनाओं को उभारने के बजाय दर्शक के लिए दृश्य अनुभव को असहज बनाता है।
यह कमी इसलिए ज्यादा महसूस होती है क्योंकि फिल्म की कहानी में काफी गहराई है। यदि सिनेमैटोग्राफी कहानी की भावनाओं के साथ बेहतर तालमेल बैठा पाती, तो फिल्म का प्रभाव और भी ज्यादा मजबूत हो सकता था।
हालांकि फिल्म का संगीत इस कमी को काफी हद तक संतुलित करता है। गाने फिल्म के मूड को बनाए रखते हैं और दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संगीत कर्णप्रिय है और भावनात्मक दृश्यों में उसका इस्तेमाल कहानी के दर्द और अकेलेपन को और गहरा करता है।
विशेष रूप से ‘आवारापन’ से जुड़ी संगीत की पुरानी भावनात्मक विरासत भी दर्शकों के अनुभव में एक अलग जुड़ाव पैदा करती है। गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनते, बल्कि कई जगह किरदारों की भावनाओं की आवाज बन जाते हैं।
एक्शन मौजूद है, लेकिन मेरे लिए फिल्म की असली ताकत एक्शन नहीं बल्कि उसके पीछे छिपी मानवीय कहानी है। बंदूक, गैंगस्टर और अपराध फिल्म का बाहरी संसार हैं; उसके भीतर असली कहानी है—एक इंसान के भीतर बची हुई संवेदना की।
फिल्म यह भी समझाती है कि संकीर्ण सोच, हिंसा और अपराध जब परिवार की संस्कृति बन जाते हैं, तो उनका असर सिर्फ वर्तमान पर नहीं पड़ता। वे अगली पीढ़ी के भविष्य को भी प्रभावित करते हैं। एक पीढ़ी जिस मानसिकता को जन्म देती है, अगली पीढ़ी उसे अपने व्यवहार में लेकर आगे बढ़ा सकती है। इस तरह अपराध केवल व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सामाजिक और भावनात्मक संरचना को तबाह कर सकता है।
और शायद यहीं फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण संदेश छिपा है—अपराध की विरासत को आगे बढ़ाना आसान है, लेकिन उसे रोकना ही असली साहस है।
‘आवारापन 2’ एक परफेक्ट फिल्म नहीं है। इसकी सिनेमैटोग्राफी, विशेषकर इंटरवल से पहले, दर्शकों को परेशान करती है और तकनीकी स्तर पर फिल्म में सुधार की गुंजाइश स्पष्ट दिखाई देती है। लेकिन इसके बावजूद फिल्म की कहानी में जो भावनात्मक और सामाजिक गहराई है, वह इसे एक बार देखने लायक जरूर बनाती है।
इमरान हाशमी का संयमित अभिनय, संवेदनशील किरदार, गहरे पारिवारिक संदेश और कर्णप्रिय संगीत फिल्म को देखने योग्य बनाते हैं।
मेरे लिए ‘आवारापन 2’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह दर्शक को केवल यह नहीं सोचने पर मजबूर करती कि अपराधी कौन है, बल्कि यह सवाल भी पूछती है कि अपराधी बनने की मानसिकता पैदा कैसे होती है और वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक क्यों पहुंचती है?
क्योंकि जब अपराध एक व्यक्ति की आदत से निकलकर परिवार की मानसिकता बन जाता है, तो उसकी कीमत सिर्फ एक इंसान नहीं चुकाता—पूरा परिवार चुकाता है।
फिल्म की कहानी में ईश्वरीय शक्ति और नियति का एक सूक्ष्म भावनात्मक संकेत भी दिखाई देता है। शिवम की पूरी यात्रा केवल अपराध और बदले की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे इंसान की यात्रा है जिसे परिस्थितियां धीरे-धीरे उसके भीतर छिपी इंसानियत से दोबारा मिलाती हैं। ऐसा महसूस होता है कि उसके जीवन में घटने वाली घटनाएं किसी अदृश्य शक्ति की तरह उसे सही और गलत के बीच का अंतर समझाने का काम करती हैं।
यही फिल्म को एक आध्यात्मिक अर्थ भी देता है—कभी-कभी इंसान अपने कर्मों से इतना दूर चला जाता है कि उसे वापस इंसानियत तक लाने के लिए जीवन स्वयं उसके सामने ऐसे रिश्ते और परिस्थितियां खड़ी कर देता है, जो उसके भीतर की संवेदना को जगा दें। शिवम के लिए यही बदलाव उसकी आत्मिक यात्रा बन जाता है।
फिल्म यह भी संकेत देती है कि इंसान कितना भी अपराध और अंधेरे में क्यों न डूब जाए, उसके भीतर सुधार और मुक्ति की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। प्रेम, करुणा और किसी दूसरे के दर्द को समझने की क्षमता ही वह शक्ति है, जो इंसान को उसके अंधेरे से बाहर निकाल सकती है।
इस दृष्टि से ‘आवारापन’ केवल एक गैंगस्टर की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि कर्म, नियति, ईश्वरीय संकेत, प्रेम और आत्मिक परिवर्तन की कहानी भी बन जाती है। यही भाव फिल्म के अंत को और अधिक अर्थपूर्ण बनाता है।
‘आवारापन 2’ को एक बार जरूर देखना चाहिए। यह केवल एक एक्शन फिल्म नहीं, बल्कि रिश्तों, अपराध, संवेदनाओं और इंसानियत के बीच संघर्ष की कहानी है।
शनिवार, 9 मई 2026
बुधवार, 29 अप्रैल 2026
रविवार, 19 अप्रैल 2026
रंगमंच से रील तक, और अब एआई की दुनिया
सिनेमा के बदलते चेहरे की दास्तान- ( रिपोर्ट: ज्योतिर्मय यादव )
---कला की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि वह समय के साथ खुद को नया रूप देती रहती है। भारतीय सिनेमा की यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही है—जहाँ इसकी जड़ें गहरे तक रंगमंच (थिएटर) में समाई हैं और शाखाएँ आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया तक फैल चुकी हैं।
रंगमंच: जहां से कहानी की शुरुआत हुई*
भारत में अभिनय और कहानी कहने की परंपरा सदियों पुरानी है। नाट्यशास्त्र जैसे ग्रंथों ने रंगमंच की नींव रखी। आगे चलकर हबीब तनवीर और इब्राहिम अल्काज़ी जैसे महान रंगकर्मियों ने थिएटर को नई ऊँचाइयाँ दीं।
मंच पर जीवंत अभिनय, संवादों की ताकत और दर्शकों से सीधा जुड़ाव—यह सब थिएटर की आत्मा थी। लेकिन समय के साथ एक नया माध्यम जन्म लेने वाला था, जिसने इस कला को एक अलग दिशा दी।
मूक फिल्में: खामोशी में भी बोलती कहानियाँ*
जब राजा हरिश्चंद्र के साथ भारतीय सिनेमा की शुरुआत हुई, तो यह पूरी तरह मूक फिल्म थी। उस दौर में दादासाहेब फाल्के ने जो साहस दिखाया, वह अपने आप में एक क्रांति थी।
उस समय थिएटर से जुड़े लोग यह मानते थे कि बिना संवाद के भावनाएँ अधूरी रह जाएंगी। लेकिन मूक फिल्मों ने यह मिथक तोड़ दिया। कलाकारों ने अपने हाव-भाव और अभिनय से वह कर दिखाया, जो शब्दों से भी अधिक प्रभावी था।
बोलती और रंगीन फिल्में: सिनेमा का स्वर्णिम दौर*
1931 में आलम आरा के साथ भारतीय सिनेमा में आवाज़ आई। यह सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं था, बल्कि कहानी कहने के तरीके में क्रांति थी। अब संवाद, गीत और संगीत ने फिल्मों को और भी जीवंत बना दिया।
इसके बाद रंगीन फिल्मों का दौर आया। किसान कन्या को भारत की पहली रंगीन फिल्मों में गिना जाता है, जिसने पर्दे पर रंगों की दुनिया बिखेर दी। आगे चलकर मुगल-ए-आज़म और शोले जैसी फिल्मों ने सिनेमा को भव्यता और तकनीक के नए शिखर तक पहुंचाया।इस दौर में फिल्म निर्माण एक विशाल उद्योग बन गया—जहाँ सैकड़ों लोगों की टीम, बड़े-बड़े सेट, महंगे कैमरे और लंबी शूटिंग प्रक्रियाएँ शामिल थीं। “लाइट, कैमरा, एक्शन” सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि पूरी एक व्यवस्था बन चुकी थी।
डिजिटल से एआई तक: अब बदल रहा है सिनेमा का चेहरा*
21वीं सदी में डिजिटल तकनीक ने फिल्म मेकिंग को आसान और सुलभ बनाया। लेकिन अब जो बदलाव सामने है, वह इससे भी कहीं बड़ा है—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दौर।
आज एआई की मदद से स्क्रिप्ट लिखी जा रही है, वर्चुअल कैरेक्टर बनाए जा रहे हैं, और बिना असली लोकेशन के ही अद्भुत दृश्य तैयार किए जा रहे हैं। जहां पहले एक फिल्म के लिए महीनों की मेहनत और भारी-भरकम संसाधनों की जरूरत होती थी, वहीं अब एक क्रिएटर अपने लैपटॉप या छोटे स्टूडियो में बैठकर पूरी फिल्म तैयार कर सकता है।
आने वाला कल: लैब से बनेगी सिनेमा की दुनिया*
जिस तरह मूक फिल्मों को शुरुआत में कमतर आंका गया था, उसी तरह आज एआई फिल्म मेकिंग को लेकर भी संदेह है। लेकिन इतिहास हमें बताता है कि हर नया माध्यम पहले सवालों के घेरे में आता है और फिर वही भविष्य बन जाता है।
आने वाले पाँच वर्षों में यह बदलाव और तेज़ होगा। यह कल्पना अब दूर नहीं कि फिल्म निर्माण के पारंपरिक तरीके—बड़ी यूनिट, महंगे सेट और भारी उपकरण—धीरे-धीरे कम होते जाएंगे। उनकी जगह लेगा एक स्मार्ट, तेज़ और व्यक्तिगत क्रिएशन का दौर, जहाँ एक व्यक्ति ही पूरी फिल्म इंडस्ट्री के बराबर काम कर सकेगा।
बदलाव ही सिनेमा की असली पहचान है*
थिएटर से मूक फिल्मों तक, मूक फिल्मों से बोलती और रंगीन फिल्मों तक, और अब एआई तक—यह यात्रा सिर्फ तकनीकी विकास की नहीं, बल्कि सोच और अभिव्यक्ति के विस्तार की कहानी है।
सिनेमा कभी ठहरा नहीं है, और न ही ठहरेगा।
हर नया दौर अपने साथ नए सवाल लाता है, लेकिन साथ ही नई संभावनाओं के दरवाजे भी खोलता है।
और यही सिनेमा की असली ताकत है—हर बार बदलना, और हर बार पहले से बेहतर बनकर उभरना।
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सिनेमा के बदलते चेहरे की दास्तान- ( रिपोर्ट: ज्योतिर्मय यादव ) ...
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AKTU के डॉ. अनुज कुमार शर्मा ने विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों की सूची में लगातार छठी बार बनाई जगह स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और एल्सेवियर की व...
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आवारापन 2- अपराध के अंधेरे में इंसानियत की तलाश "कुछ फिल्में केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनतीं, बल्कि वे समाज और इंसान ...


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