बुधवार, 13 अगस्त 2025

जैव-विविधता

 प्रकृति से जुड़ाव 60% घटा

 बच्चों की परवरिश और शहरों की डिजाइन बदलना ही समाधान


REPORT-JYOTIRMAY YADAV

लखनऊ। एक चौंकाने वाले अध्ययन ने खुलासा किया है कि 1800 के बाद से मनुष्य का प्रकृति से जुड़ाव 60% से अधिक घट चुका है। यह गिरावट सिर्फ हमारे जीवनशैली में ही नहीं, बल्कि हमारी भाषा और संस्कृति में भी दिखाई देती है—साहित्य में “नदी,” “काई” और “कलियाँ” जैसे शब्दों का इस्तेमाल लगातार कम होता गया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ डर्बी के प्रोफेसर माइल्स रिचर्डसन के नेतृत्व में किए गए इस शोध को हाल ही में अर्थ पत्रिका में प्रकाशित किया गया। अध्ययन में शहरीकरण, जैव-विविधता में कमी, और पारिवारिक आदतों में बदलाव के ऐतिहासिक आंकड़ों का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश की गई कि किस तरह प्रकृति हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से दूर होती चली गई।

📉 “अनुभव का विलुप्त होना”

अध्ययन में इस प्रक्रिया को Extinction of Experience नाम दिया गया है—यानी वह स्थिति जब पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों का प्रकृति से जुड़ाव धीरे-धीरे मिटता चला जाता है। शोध का अनुमान है कि यदि अगले 25 वर्षों में बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं किए गए, तो यह गिरावट जारी रहेगी।

🌱 समाधान – बचपन से प्रकृति और हरित शहर

शोध में बताया गया कि सबसे असरदार उपाय है—बचपन से बच्चों को प्रकृति से जोड़ना और शहरों में बड़े पैमाने पर हरियाली लाना।

  • ग्रीन स्पेस बढ़ाने की ज़रूरत: मौजूदा नीतियाँ 30% हरित क्षेत्र बढ़ाने को महत्व देती हैं, लेकिन रिचर्डसन के मॉडल के अनुसार यह बढ़ोतरी कम से कम 10 गुना होनी चाहिए।

  • जैव-विविध शहरी वातावरण: शहरों में सिर्फ पार्क नहीं, बल्कि पेड़ों, पौधों, पक्षियों और जलस्रोतों से भरपूर इलाकों की आवश्यकता है।

  • भाषा और संस्कृति का जुड़ाव: किताबों और कहानियों में प्रकृति-शब्दों का फिर से बढ़ना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह स्थायी बदलाव है या सिर्फ एक रुझान, यह अभी स्पष्ट नहीं।

🧠 मानसिक स्वास्थ्य में अल्पकालिक लाभ

कम अवधि के जुड़ाव कार्यक्रम, जैसे “नेचर वॉक” या “ग्रीन थेरेपी,” मानसिक स्वास्थ्य को तो बेहतर बनाते हैं, लेकिन लंबे समय के जुड़ाव के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं।

⚠️ चुनौती नीतियों से बड़ी

शोध के अनुसार, मौजूदा पर्यावरणीय नीतियों की तुलना में कहीं बड़े और साहसिक कदम उठाने की आवश्यकता है। यह सिर्फ पर्यावरण का मामला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, शैक्षिक और शहरी योजना का भी मुद्दा है।

प्रो. रिचर्डसन का कहना है

“हम बच्चों में प्रकृति के प्रति स्वाभाविक आकर्षण को बनाए रखें, और हमारे शहर ऐसे हों जहां जैव-विविधता सांस ले सके, तभी आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति के साथ अपना बंधन दोबारा मजबूत कर पाएंगी।”

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