शनिवार, 31 जनवरी 2026

यूनिवर्सिटी ऑफ ऑस्टिन: एक अलग सोच

अमेरिका में शिक्षा का नया प्रयोग: क्या भारत के लिए भी है कोई सीख ?

 एक रिपोर्ट ,लखनऊ 

अमेरिका के अरबपति निवेशक जेफ यास ने उच्च शिक्षा की दुनिया में एक बड़ा और अनोखा कदम उठाया है। उन्होंने हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ ऑस्टिन को 100 मिलियन डॉलर (लगभग 830 करोड़ रुपये) का दान दिया है, ताकि वहाँ पढ़ने वाले छात्रों के लिए हमेशा के लिए मुफ्त शिक्षा सुनिश्चित की जा सके।

इस दान के साथ जेफ यास ने सिर्फ़ एक शर्त रखी

👉 विश्वविद्यालय कभी भी किसी भी प्रकार की सरकारी फंडिंग स्वीकार नहीं करेगा।उनका मानना है कि जब शिक्षा संस्थान सरकार के पैसों पर निर्भर होते हैं, तो उन पर नीतिगत दबाव, विचारधारात्मक हस्तक्षेप और नौकरशाही नियंत्रण बढ़ जाता है। निजी दान के ज़रिये वे यह साबित करना चाहते हैं कि उच्च शिक्षा बिना सरकारी दखल के भी स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से चलाई जा सकती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ऑस्टिन: एक अलग सोच

2021 में स्थापित यह विश्वविद्यालय आधुनिक अकादमिक ढांचे के आलोचकों द्वारा शुरू किया गया है। यहाँ ज़ोर दिया जाता है:

फ्री स्पीच (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता)

मेरिट-बेस्ड एडमिशन

और आइडियोलॉजिकल न्यूट्रैलिटी फिलहाल यह संस्थान लिबरल स्टडीज़ में चार वर्षीय डिग्री देता है। अभी यहाँ केवल 150 छात्र हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में यह संख्या 500 तक ले जाने की योजना है।

भारत के लिए क्या मायने रखती है यह ख़बर?

भारत में उच्च शिक्षा का परिदृश्य इससे काफ़ी अलग है:

सरकारी विश्वविद्यालय फंडिंग की कमी,निजी विश्वविद्यालय ऊँची फीस,और छात्र लोन के बोझ से जूझते हैं।

ऐसे में जेफ यास का यह मॉडल कई सवाल खड़े करता है:

क्या भारत में भी बड़े उद्योगपति या परोपकारी संस्थाएं मुफ्त उच्च शिक्षा का मॉडल अपनाने को तैयार हैं?

क्या शिक्षा को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण से बाहर रखकर स्वतंत्र और गुणवत्तापूर्ण बनाया जा सकता है ?

क्या यह मॉडल भारत जैसे विशाल और विविध देश में व्यावहारिक हो सकता है?

हालांकि भारत में सामाजिक असमानता और जनसंख्या का दबाव अमेरिका से कहीं ज़्यादा है, फिर भी यह उदाहरण दिखाता है कि इच्छाशक्ति और संसाधनों के साथ शिक्षा को कर्ज़-मुक्त बनाया जा सकता है।जेफ यास का यह कदम केवल एक दान नहीं, बल्कि शिक्षा के भविष्य पर एक वैचारिक प्रयोग है। भारत के नीति-निर्माताओं, उद्योगपतियों और शिक्षा विशेषज्ञों के लिए यह सोचने का अवसर है कि क्या शिक्षा को मुनाफ़े और राजनीति से ऊपर उठाकर एक सच्चा सार्वजनिक हित बनाया जा सकता है?

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