गुरुवार, 28 अगस्त 2025

मूवी रिव्य

 🎬 महावतार नरसिंह 


समीक्षक – ज्योतिर्मय यादव, फोटोग्राफर एवं फिल्ममेकर, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

   भारतीय सिनेमा में पौराणिक कथाओं पर आधारित एनिमेटेड फिल्में अभी भी कम बनती हैं। इसी बीच निर्देशक अश्विन कुमार की महावतार नरसिंह भारतीय संस्कृति और अध्यात्म को आधुनिक दर्शकों तक पहुँचाने का साहसिक प्रयास है।

फिल्म केवल धार्मिक कथा नहीं सुनाती, बल्कि अहंकार, लोभ, वासना और ईर्ष्या जैसे मानवीय दोषों को उजागर करती है और दिखाती है कि अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।

कहानी और प्रस्तुति

शुरुआत थोड़ी धीमी जरूर लगती है, लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, यह दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेती है।अश्विन कुमार ने नरसिंह अवतार की कथा को सरल और भावनात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है, जिससे यह न केवल बच्चों बल्कि युवाओं और वयस्कों के लिए भी प्रेरणादायक बन जाती है।

🎥 निर्देशन और विज़न

अश्विन कुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी स्टोरीटेलिंग है।उन्होंने भारत के प्राचीन महाकाव्यों को आज की संवेदनाओं से जोड़ते हुए यह साबित किया है कि पौराणिक कथाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।निर्देशक की दृष्टि और भावनात्मक गहराई इस फिल्म को साधारण से असाधारण बनाती है।

🖥 एनीमेशन और तकनीकी पहलू

फिल्म का एनीमेशन अच्छा है, लेकिन विश्वस्तरीय मानकों तक पहुँचने के लिए और सुधार की गुंजाइश है।किरदारों के हावभाव, युद्ध के दृश्य और गानों की कोरियोग्राफी थोड़ी और बारीकी से गढ़ी जाती तो यह फिल्म एक नायाब मास्टरपीस बन सकती थी।इसके बावजूद, सीमित संसाधनों में निर्देशक ने जो विज़ुअल संसार रचा है, वह दर्शकों को प्रभावित करने में सफल रहता है।

🎭 भावनाएँ और संदेश

फिल्म यह संदेश देती है कि —

बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः अच्छाई ही जीतती है।समय का महत्व, आत्मबल, और ईश्वर की कृपा जीवन को सार्थक बनाते हैं।होलिका दहन जैसे त्योहारों का महत्व भी फिल्म बड़ी खूबसूरती से समझाती है।

⚔ क्लाइमैक्स

नरसिंह का अवतार और राक्षस के साथ अंतिम युद्ध फिल्म का सबसे रोमांचक हिस्सा है।यह दृश्य श्रद्धा और उत्साह से भरा है, और दर्शकों को एक यादगार अनुभव देता है।

🎯 क्यों देखें

पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति में रुचि रखते हैं।एनिमेशन फिल्मों के शौकीन हैं।बच्चों को सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों से जोड़ना चाहते हैं।तो महावतार नरसिंह आपके लिए बेहतरीन विकल्प है।कुछ तकनीकी सीमाओं के बावजूद यह फिल्म भारतीय एनिमेशन सिनेमा में एक साहसिक और प्रशंसनीय कदम है।निर्देशक अश्विन कुमार ने यह साबित किया है कि आने वाले समय में भारतीय एनिमेशन हॉलीवुड को भी चुनौती दे सकता है।

👉 कुल मिलाकर, महावतार नरसिंह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि आस्था, रोमांच और कला का संगम है।

रेटिंग – ⭐⭐⭐⭐ (4/5)

(मजबूत कहानी, भावनात्मक अपील और प्रेरक संदेश; तकनीकी सुधार की थोड़ी गुंजाइश)


बुधवार, 13 अगस्त 2025

जैव-विविधता

 प्रकृति से जुड़ाव 60% घटा

 बच्चों की परवरिश और शहरों की डिजाइन बदलना ही समाधान


REPORT-JYOTIRMAY YADAV

लखनऊ। एक चौंकाने वाले अध्ययन ने खुलासा किया है कि 1800 के बाद से मनुष्य का प्रकृति से जुड़ाव 60% से अधिक घट चुका है। यह गिरावट सिर्फ हमारे जीवनशैली में ही नहीं, बल्कि हमारी भाषा और संस्कृति में भी दिखाई देती है—साहित्य में “नदी,” “काई” और “कलियाँ” जैसे शब्दों का इस्तेमाल लगातार कम होता गया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ डर्बी के प्रोफेसर माइल्स रिचर्डसन के नेतृत्व में किए गए इस शोध को हाल ही में अर्थ पत्रिका में प्रकाशित किया गया। अध्ययन में शहरीकरण, जैव-विविधता में कमी, और पारिवारिक आदतों में बदलाव के ऐतिहासिक आंकड़ों का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश की गई कि किस तरह प्रकृति हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से दूर होती चली गई।

📉 “अनुभव का विलुप्त होना”

अध्ययन में इस प्रक्रिया को Extinction of Experience नाम दिया गया है—यानी वह स्थिति जब पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों का प्रकृति से जुड़ाव धीरे-धीरे मिटता चला जाता है। शोध का अनुमान है कि यदि अगले 25 वर्षों में बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं किए गए, तो यह गिरावट जारी रहेगी।

🌱 समाधान – बचपन से प्रकृति और हरित शहर

शोध में बताया गया कि सबसे असरदार उपाय है—बचपन से बच्चों को प्रकृति से जोड़ना और शहरों में बड़े पैमाने पर हरियाली लाना।

  • ग्रीन स्पेस बढ़ाने की ज़रूरत: मौजूदा नीतियाँ 30% हरित क्षेत्र बढ़ाने को महत्व देती हैं, लेकिन रिचर्डसन के मॉडल के अनुसार यह बढ़ोतरी कम से कम 10 गुना होनी चाहिए।

  • जैव-विविध शहरी वातावरण: शहरों में सिर्फ पार्क नहीं, बल्कि पेड़ों, पौधों, पक्षियों और जलस्रोतों से भरपूर इलाकों की आवश्यकता है।

  • भाषा और संस्कृति का जुड़ाव: किताबों और कहानियों में प्रकृति-शब्दों का फिर से बढ़ना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह स्थायी बदलाव है या सिर्फ एक रुझान, यह अभी स्पष्ट नहीं।

🧠 मानसिक स्वास्थ्य में अल्पकालिक लाभ

कम अवधि के जुड़ाव कार्यक्रम, जैसे “नेचर वॉक” या “ग्रीन थेरेपी,” मानसिक स्वास्थ्य को तो बेहतर बनाते हैं, लेकिन लंबे समय के जुड़ाव के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं।

⚠️ चुनौती नीतियों से बड़ी

शोध के अनुसार, मौजूदा पर्यावरणीय नीतियों की तुलना में कहीं बड़े और साहसिक कदम उठाने की आवश्यकता है। यह सिर्फ पर्यावरण का मामला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, शैक्षिक और शहरी योजना का भी मुद्दा है।

प्रो. रिचर्डसन का कहना है

“हम बच्चों में प्रकृति के प्रति स्वाभाविक आकर्षण को बनाए रखें, और हमारे शहर ऐसे हों जहां जैव-विविधता सांस ले सके, तभी आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति के साथ अपना बंधन दोबारा मजबूत कर पाएंगी।”

बुधवार, 6 अगस्त 2025

 

🧠 ब्रेकिंग साइंस 

अब सामने आई मानव शरीर की ‘सातवीं इंद्रिय’ — पेट से मस्तिष्क तक सीधा संवाद, बदल सकती है इलाज की दिशा

🌐 रिपोर्ट: ज्योतिर्मय यादव, लखनऊ

शोध: ड्यूक यूनिवर्सिटी, अमेरिका

📅 08 AUG.2025 | स्रोत: प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका "नेचर"

मानव शरीर की जटिलता को एक और परत में वैज्ञानिकों ने खोल दिया है। ड्यूक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक नई ‘सातवीं इंद्रिय’ (Seventh Sense) की खोज की है — जो पेट (आंत) और मस्तिष्क के बीच सीधा, तत्काल और रासायनिक संवाद स्थापित करती है।

यह इंद्रिय न तो देखने, सुनने या छूने जैसी है, बल्कि यह शरीर के आंतरिक जैविक संकेतों को समझती है — और गट माइक्रोबायोम (आंतों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों) की जानकारी को सीधे मस्तिष्क तक पहुंचाकर भूख, भावना और व्यवहार को प्रभावित करती है।


🧪 क्या है "सातवीं इंद्रिय" – वैज्ञानिक नाम: Neurobiotic Sense

वैज्ञानिकों ने इस नई संवेदी प्रणाली को "न्यूरोबायोटिक सेंस" नाम दिया है।
यह प्रणाली आंत में मौजूद विशेष कोशिकाओं – न्यूरोपोड्स (Neuropods) द्वारा कार्य करती है।

जब हम खाना खाते हैं, तो आंतों में मौजूद सूक्ष्मजीव—गट बैक्टीरिया—एक खास प्रोटीन फ्लैजेलिन (Flagellin) छोड़ते हैं।
यह प्रोटीन न्यूरोपोड्स द्वारा पहचाना जाता है, जो तुरंत वागस नर्व (Vagus Nerve) के ज़रिए मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं कि

“अब पेट भर चुका है – खाना बंद करें।”

यह संवाद केवल कुछ सेकंड्स में हो जाता है, जो इसे अन्य इंद्रियों से भी अधिक तीव्र बनाता है।


🧬 प्रयोग से क्या निकला सामने?

शोध में चूहों पर यह प्रयोग किया गया। कुछ चूहों में TLR5 नामक रिसेप्टर को निष्क्रिय कर दिया गया।
परिणाम यह रहा कि इन चूहों ने

  • आवश्यकता से अधिक खाना शुरू कर दिया

  • भूख को नियंत्रित नहीं कर पाए

  • असंतुलित व्यवहार दिखाया

इससे सिद्ध हुआ कि यह सातवीं इंद्रिय भोजन, मस्तिष्कीय संतुलन और भावनात्मक व्यवहार को गहराई से नियंत्रित करती है।


🧠 क्या मस्तिष्क को पेट से आदेश मिलते हैं?

जी हां। यह खोज "Gut-Brain Axis" के सिद्धांत को और गहराई देती है।
अब तक माना जाता था कि मस्तिष्क ही सब नियंत्रित करता है, लेकिन यह सातवीं इंद्रिय सिद्ध करती है कि:

🔁 पेट भी मस्तिष्क को आदेश देता है – और वह भी वर्तमान समय (Real-Time) में।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आंखें रोशनी पहचानती हैं, कान ध्वनि सुनते हैं —
वैसे ही पेट के न्यूरोपोड्स "गट के रासायनिक संदेश" पहचानते हैं और मस्तिष्क को तुरंत प्रतिक्रिया के लिए तैयार करते हैं।


⚕️ इस खोज से क्या बदल सकता है?

🔹 मोटापे की नई चिकित्सा

अब तक मोटापा सिर्फ कैलोरी या जीवनशैली से जोड़ा जाता था। लेकिन अब माना जा रहा है कि सातवीं इंद्रिय की कमजोरी या असंतुलन से भी मोटापा हो सकता है।

🔹 डिप्रेशन और चिंता में नई दिशा

चूंकि यह तंत्र मूड और भावनाओं पर असर डालता है, इसलिए यह डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी मानसिक बीमारियों में क्रांतिकारी इलाज का मार्ग खोल सकता है।

🔹 मानसिक और व्यवहारिक विकारों में गट माइक्रोबायोम की भूमिका

अब इलाज केवल दवाओं तक सीमित नहीं रहेगा—बल्कि डॉक्टर गट बैक्टीरिया को सुधारकर मानसिक स्थिति को ठीक करने का रास्ता खोज सकते हैं।


🧠 पेट अब सिर्फ "पाचन तंत्र" नहीं, बल्कि "सुपर इंद्रिय" केंद्र है

मुख्य शोधकर्ता डॉ. डिएगो वी. बोहॉर्केज़ कहते हैं:

“यह पहली बार है कि हमने देखा कि गट माइक्रोबायोम मस्तिष्क से तात्कालिक संवाद कर सकता है। यह हमारी सोच, कार्य और अनुभव करने की प्रक्रिया को ही बदल देता है।”


🔍 निष्कर्ष:

पहलूसातवीं इंद्रिय की भूमिका
🥗 भूख नियंत्रणतुरंत मस्तिष्क को भोजन का सिग्नल देना
💭 मानसिक स्वास्थ्यमूड, अवसाद, चिंता पर गहरा प्रभाव
🤯 व्यवहारनिर्णय क्षमता, प्रतिक्रिया और संतुलन
🧬 जैविक विज्ञानमस्तिष्क–गट कनेक्शन का वैज्ञानिक प्रमाण
⚕️ चिकित्सानई दवाओं और माइक्रोबायोटिक ट्रीटमेंट का मार्ग

📌 यह खोज मानव शरीर को समझने का एक नया अध्याय है। अब पेट और मस्तिष्क एक-दूसरे के साझेदार हैं—और सातवीं इंद्रिय इस गुप्त संवाद का सेतु है।

रविवार, 3 अगस्त 2025

CO₂ से बना 'तरल खजाना

 

"अब प्रदूषण उगलेगा सोना": CO₂ से बना 'तरल खजाना', वैज्ञानिकों की क्रांतिकारी खोज

रिपोर्ट: ज्योतिर्मय यादव, लखनऊ

लखनऊ:📅 2 अगस्त 2025


जिस गैस को आज तक जलवायु विनाश का प्रतीक माना जाता था, वही अब भविष्य की समृद्धि का स्रोत बनने जा रही है। दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) से एक बेहद बहुमूल्य रसायन — एलील अल्कोहल (Allyl Alcohol) — बनाने में सफलता हासिल की है, और वह भी अब तक की दुनिया की सबसे कुशल प्रक्रिया के ज़रिए।

इस क्रांतिकारी तकनीक को विकसित किया है ग्वांगजू इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (GIST) के वैज्ञानिक डॉ. जययोंग ली और उनकी टीम ने।

"हमने सिर्फ प्रदूषण को रोका नहीं, उसे आर्थिक संपत्ति में बदला है। यह भविष्य का विज्ञान है, और आने वाली पीढ़ियों की अर्थव्यवस्था का आधार भी।"
डॉ. जययोंग ली, प्रमुख वैज्ञानिक, GIST


🧪 क्या है ये ‘तरल सोना’ ?

इस नवाचार में CO₂ से बना गया रसायन एलील अल्कोहल (C₃H₆O) को "तरल सोना" कहा जा रहा है, क्योंकि इसका उपयोग प्लास्टिक, परफ्यूम, कीटनाशक, चिपकने वाले पदार्थ और रबर उद्योगों में बड़े पैमाने पर होता है।

दुनिया भर में इस रसायन की भारी मांग है — और अब यह मांग सीधे प्रदूषण से पूरी हो सकती है।


🔬 विज्ञान की जादुई प्रक्रिया: कैसे बना तरल खजाना ?

इस सफलता की चाबी है एक नवीन तांबा-आधारित उत्प्रेरक, जिसमें फास्फोरस की अधिक मात्रा है। यह उत्प्रेरक CO₂ को सीधे Allyl Alcohol में बदलता है, बिना किसी जटिल बायप्रोडक्ट के।

तकनीक की दक्षता: 66.9% बिजली सीधे उत्पाद में बदलती है, जो अब तक की सभी तकनीकों से चार गुना अधिक प्रभावी है।
इलेक्ट्रोकेमिकल सिस्टम और स्पेशल मेम्ब्रेन से यह प्रक्रिया तेज़, नियंत्रित और बेहद कुशल बनी है।


⚙️ कैसे अलग है यह तकनीक ?

पुरानी तकनीक                                       vs                                         नई तकनीक

पुरानी तकनीक                                                                                         नई खोज
CO₂ → CO → कई स्टेप्स                                                                           CO₂ → Allyl Alcohol सीधे
ऊर्जा-खपत ज्यादा                                                                            दक्षता 4 गुना बेहतर
अस्थिर बायप्रोडक्ट                                                                           स्थिर और मूल्यवान उत्पाद




🌍 संभावनाओं की दुनिया: धुआं बनेगा दौलत

इस तकनीक से स्टील, सीमेंट, पेट्रोकेमिकल और रसायन उद्योग अपने CO₂ उत्सर्जन को कम कर सकते हैं — और उसी प्रदूषण से कमाई भी कर सकते हैं।

"यह नवाचार सिर्फ पर्यावरण की रक्षा नहीं करता, यह प्रदूषण को संसाधन में बदलकर उद्योगों के लिए नया भविष्य गढ़ता है।"
मिनजुन चोई, सह-शोधकर्ता, GIST


📚 वैज्ञानिक उपलब्धि को मिला वैश्विक मंच

यह शोध 22 मई 2025 को प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘नेचर कैटालिसिस’ (Nature Catalysis) में प्रकाशित हुआ।
शोध शीर्षक:

"Selective formaldehyde condensation on phosphorus-rich copper catalyst to produce liquid C₃⁺ chemicals in electrocatalytic CO₂ reduction."


🏁 धुएं से दौलत, और वो भी टिकाऊ

यह खोज दर्शाती है कि पर्यावरण संकट से केवल लड़ना ही नहीं, उसे अवसर में बदलना भी संभव है।
सही दिशा और नीति-निर्माण के साथ, वह दिन दूर नहीं जब
"धुएं से दौलत निकलेगी — और धरती मुस्कुराएगी।"


📌 यह रिपोर्ट खास तौर पर पर्यावरण नीति-निर्माताओं, निवेशकों, स्टार्टअप्स और उद्योगपतियों के लिए नई सोच और हरित भविष्य की संभावनाओं का संकेत है।

ऐ आई स्मार्ट क्लीनिक

  " AI क्लीनिक" और चिकित्सा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्रांतिकारी बदलावों पर एक विस्तृत रिपोर्ट : डॉक्टर से पहले AI पकड़ेगा आपक...