शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

जिस देश की मुद्रा की वैल्यू मज़बूत होती है, वहाँ युवाओं के सपने बड़े होते हैं।

 जिस देश की मुद्रा की वैल्यू कमज़ोर, वहाँ सपने मजबूर हो जाते है I




 विशेष रिपोर्ट - ज्योतिर्मय यादव 

किसी देश की अर्थव्यवस्था कैसे तय करती है युवाओं का भविष्य ,देश की असली ताक़त उसकी सीमाओं या इमारतों से नहीं, बल्कि उस आर्थिक व्यवस्था और मुद्रा की वैल्यू से तय होती है, जिसमें उसका युवा आगे बढ़ता है। जिस देश की मुद्रा की वैल्यू मज़बूत होती है, वहाँ युवाओं के सपने बड़े होते हैं। और जहाँ मुद्रा की वैल्यू कमज़ोर होती है, वहाँ सपने रोज़मर्रा की ज़रूरतों तक सिमट जाते हैं।

🔴 कमज़ोर अर्थव्यवस्था: पहले ज़िंदगी, फिर सपने

कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले देशों में युवा सबसे पहले यही सोचता है—

“काम मिलेगा या नहीं ?” महंगाई बढ़ती है, आमदनी घटती है और भविष्य अनिश्चित हो जाता है। ऐसे हालात में युवा अपने शौक़ और हुनर को पीछे छोड़ देता है। यहाँ युवाओं के सपने होते हैं: किसी तरह स्थायी नौकरी मिल जाए ,विदेश जाकर काम करने का मौक़ा मिल जाए ,परिवार का गुज़ारा ठीक से हो जाए ,वेनेज़ुएला का इंजीनियर टैक्सी चलाने को मजबूर है, पाकिस्तान का डॉक्टर विदेश में कम वेतन पर काम करने को तैयार है। पढ़ाई बड़ी है, लेकिन सपने छोटे। यहाँ सपना होता है— देश छोड़ना, ताकि ज़िंदगी बन सके।

🟢 मज़बूत अर्थव्यवस्था: सपनों को खुला आसमान

जहाँ अर्थव्यवस्था स्थिर होती है और मुद्रा की वैल्यू मज़बूत होती है, वहाँ युवा डर में नहीं, आत्मविश्वास में जीता है।

जब रोज़ी–रोटी की चिंता कम होती है, तब सोच बड़ी हो जाती है। यहाँ युवाओं के सपने होते हैं:

अपना स्टार्टअप शुरू करना नई तकनीक और नए विचार लाना ,खेल, कला या विज्ञान में पहचान बनाना ,अमेरिका का छात्र पढ़ाई के साथ बिज़नेस शुरू करता है, जर्मनी का युवा नई मशीनें डिज़ाइन करता है। यहाँ सपना होता है—दुनिया में कुछ नया जोड़ना।

💱 मुद्रा की वैल्यू तय करती है सोच की ऊँचाई

कमज़ोर मुद्रा की वैल्यू में मेहनत सिर्फ़ खर्च निकालती है।

मज़बूत मुद्रा की वैल्यू में वही मेहनत बचत, निवेश और भविष्य बनाती है।

इसीलिए—

कमज़ोर देश का युवा पूछता है: “नौकरी मिलेगी?”

मज़बूत देश का युवा पूछता है: “मैं क्या नया कर सकता हूँ?”

🧠 सोच का साफ़ अंतर

कमज़ोर अर्थव्यवस्था  डर में फैसले , नौकरी की तलाश,अवसरों की तलाश,आज की चिंता

मज़बूत अर्थव्यवस्था  भरोसे में फैसले,आने वाले कल की तैयारी,युवा हर देश में मेहनती और काबिल होता है,

लेकिन अर्थव्यवस्था और मुद्रा की वैल्यू तय करती है कि उसके सपने कितने दूर तक जा सकते हैं।

जहाँ मुद्रा की वैल्यू कमज़ोर होती है, वहाँ सपने मजबूरी बन जाते हैं।

जहाँ मुद्रा की वैल्यू मज़बूत होती है, वहाँ सपने मंज़िल बनते हैं।

— विशेष संवाददाता

सोमवार, 19 जनवरी 2026

क्या ओपन ए आई का खेल खत्म हो जाएगा

OpenAI पर मंडरा रहा है आर्थिक संकट, 2026 ‘करो या मरो’ का साल !



रिपोर्ट- ज्योतिर्मय यादव 

लखनऊ 

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में क्रांति लाने वाली कंपनी OpenAI गंभीर आर्थिक संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार, कंपनी बेहद तेज़ी से अपना पैसा खर्च कर रही है और यदि यही रफ्तार रही तो आने वाले डेढ़ साल में उसके फंड खत्म हो सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, OpenAI ने अकेले 2025 में 8 अरब डॉलर से अधिक की राशि खर्च कर दी। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ विश्लेषक सेबेस्टियन मल्लबी ने न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख में चेतावनी दी है कि OpenAI का बिज़नेस मॉडल Google, Meta और Microsoft जैसी दिग्गज टेक कंपनियों की तुलना में कहीं ज़्यादा जोखिम भरा है।

मल्लबी के अनुसार, जहां बड़ी टेक कंपनियां अपने मौजूदा मुनाफ़े से AI रिसर्च को फंड कर सकती हैं, वहीं OpenAI पूरी तरह बाहरी निवेश पर निर्भर है। इसके बावजूद कंपनी ने इस दशक के अंत तक AI विकास पर एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च करने की प्रतिबद्धता जताई है।

विश्लेषकों का मानना है कि ChatGPT जैसे उत्पादों के लिए उपयोगकर्ताओं की भुगतान करने की इच्छा सीमित है, जबकि विज्ञापन जैसे नए राजस्व स्रोत अभी शुरुआती दौर में हैं। ऐसे में कंपनी के लिए लगातार पूंजी जुटाना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

सेबेस्टियन मल्लबी का कहना है कि यह भविष्यवाणी AI तकनीक के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि महंगे होते AI रेस में OpenAI पिछड़ सकता है। उनका अनुमान है कि अगर OpenAI पर्याप्त पूंजी नहीं जुटा पाया, तो वह Microsoft या Amazon जैसी किसी नकदी-समृद्ध कंपनी में विलय कर सकता है और इतिहास में एक उदाहरण बनकर रह जाएगा।अन्य विशेषज्ञ भी 2026 को OpenAI के लिए ‘मेक-ऑर-ब्रेक’ वर्ष बता रहे हैं। कुछ लोग इसकी आक्रामक विस्तार नीति की तुलना WeWork जैसी असफल स्टार्टअप कंपनी से कर रहे हैं। हालांकि, मल्लबी यह भी स्पष्ट करते हैं कि यदि OpenAI असफल होता है, तो इससे वैश्विक AI बूम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बल्कि यह उस कंपनी का पतन होगा, जिसे वे AI इंडस्ट्री का “सबसे ज़्यादा हाइप-ड्रिवन खिलाड़ी” बताते हैं। इसके बावजूद, OpenAI की तेज़ उभरान और संभावित गिरावट AI के निर्माण और फाइनेंसिंग के तरीके पर गहरी छाप छोड़ सकती है।

संदर्भ:

सेबेस्टियन मल्लबी, न्यूयॉर्क टाइम्स (13 जनवरी 2026)

विक्टर टैंगरमैन, फ्यूचरिज़्म (14 जनवरी 2026)

प्याज़ संभाल कर खाएं

 REPORT: JYOTIRMAY YADAV 


 

प्याज़ पर दिखने वाली काली परत: मिट्टी नहीं, फंगस का संकेत :

अक्सर रसोई में इस्तेमाल होने वाले प्याज़ के छिलकों पर दिखाई देने वाली काली, चूर्णनुमा परत को लोग साधारण मिट्टी समझ लेते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह गंदगी नहीं, बल्कि Aspergillus niger नामक एक फंगस (कवक) है, जो आमतौर पर कटाई के बाद प्याज़ को अधिक नमी और खराब वायु संचार वाली जगहों पर रखने से विकसित हो जाता है।यह फंगस मुख्य रूप से प्याज़ की सूखी, काग़ज़ी बाहरी परतों पर पनपता है। सही पहचान करना इसलिए ज़रूरी है, ताकि रसोई में भोजन की सुरक्षा बनी रहे और सब्ज़ियाँ अधिक समय तक सुरक्षित रखी जा सकें।

कितना सुरक्षित है ऐसा प्याज़?

विशेषज्ञों का कहना है कि प्याज़ की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि फंगस कितनी गहराई तक पहुँचा है। यदि काले धब्बे केवल बाहरी छिलकों तक सीमित हों, तो प्रभावित परतों को हटाकर अंदर के सख़्त, गंधहीन प्याज़ का उपयोग किया जा सकता है।लेकिन यदि प्याज़ नरम हो गया हो, उसमें चिपचिपापन आ गया हो या दुर्गंध आने लगे, तो उसे तुरंत फेंक देना चाहिए।

पकाने से खतरा खत्म नहीं होता

यह एक आम भ्रांति है कि पकाने से समस्या समाप्त हो जाती है। जबकि पकाने से फंगस तो नष्ट हो सकता है, लेकिन उससे उत्पन्न हानिकारक मायकोटॉक्सिन्स पूरी तरह समाप्त नहीं होते, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं।विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि प्याज़ को सूखी, ठंडी और हवादार जगह पर संग्रहित किया जाए, ताकि नमी से बचाव हो और फंगस पनपने की संभावना कम हो।

स्रोत: यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया, एग्रीकल्चर एंड नेचुरल रिसोर्सेज (2023), स्टेटवाइड इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट प्रोग्राम

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

गरम, ठंडा या गुनगुना स्नान

 : मौसम और सेहत के अनुसार सही चुनाव

— स्वास्थ्य डेस्क (रिपोर्ट: ज्योतिर्मय यादव)


स्नान केवल दैनिक दिनचर्या का हिस्सा नहीं, बल्कि शरीर और मन को संतुलित रखने का एक प्रभावी माध्यम भी है। पानी का तापमान बदलकर हम अपनी ऊर्जा, एकाग्रता और विश्राम की अवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गरम, ठंडा और गुनगुना—तीनों प्रकार के स्नान के अपने अलग-अलग लाभ हैं, जिन्हें मौसम, समय और शरीर की स्थिति के अनुसार अपनाना चाहिए।

सुबह ठंडा स्नान: ताज़गी और सजगता का स्रोत

सुबह ठंडे पानी से स्नान करने पर शरीर में नॉरएड्रेनालिन हार्मोन का स्राव बढ़ता है, जिससे नींद टूटती है और मानसिक स्पष्टता बढ़ती है। ठंडा पानी रक्त संचार को सक्रिय करता है, सूजन कम करने में सहायक होता है और चयापचय प्रक्रिया को गति देता है।खेल और व्यायाम से जुड़े लोगों में ठंडा स्नान मांसपेशियों की थकान और दर्द को कम करने के लिए विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। नियंत्रित ठंडा तनाव प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने में भी सहायक हो सकता है।

शाम का गरम स्नान: तनावमुक्ति और बेहतर नींद

दिनभर की भागदौड़ और मानसिक दबाव के बाद गरम पानी से स्नान शरीर को आराम की अवस्था में लाता है। यह तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल को कम करता है, जकड़े हुए जोड़ों और मांसपेशियों को ढीला करता है तथा गहरी नींद के लिए शरीर को तैयार करता है। हालाँकि त्वचा विशेषज्ञ यह चेतावनी भी देते हैं कि अत्यधिक गरम पानी त्वचा के प्राकृतिक तेलों को नष्ट कर सकता है, जिससे रूखापन और एक्ज़िमा जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

गुनगुना स्नान: कड़ाके की सर्दी में सुरक्षित विकल्प

विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत अधिक सर्दी के दिनों में सुबह ठंडे पानी से स्नान करना सभी के लिए उपयुक्त नहीं होता। ऐसे मौसम में गुनगुने पानी से स्नान शरीर के तापमान को संतुलित बनाए रखता है और सर्दी-जुकाम के खतरे को कम करता है।

बुज़ुर्गों, बच्चों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों के लिए यह सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है। गुनगुना पानी शरीर को झटका दिए बिना ताजगी प्रदान करता है।

दोनों का संतुलन: मिश्रित स्नान का तरीका

जो लोग गरम और ठंडे दोनों स्नानों के लाभ चाहते हैं, उनके लिए विशेषज्ञ एक सरल उपाय सुझाते हैं—पहले गरम या गुनगुने पानी से स्नान करें और अंत में 20–30 सेकंड के लिए ठंडा पानी डालें। इससे मांसपेशियों को आराम भी मिलता है और रक्त संचार सक्रिय होकर मानसिक स्पष्टता भी बढ़ती है। 

स्नान का सही तापमान कोई एक नियम नहीं, बल्कि मौसम, समय और व्यक्ति की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। सुबह ठंडा स्नान ऊर्जा और सजगता देता है, शाम का गरम स्नान विश्राम और नींद में सहायक होता है, जबकि कड़ाके की सर्दी में गुनगुना स्नान सबसे संतुलित और सुरक्षित विकल्प है। सही चुनाव करके स्नान को स्वास्थ्य-साधना का रूप दिया जा सकता है।

स्रोत: हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल (2023)

रविवार, 9 नवंबर 2025

थैचर इफेक्ट

 🧠 थैचर इफेक्ट: जब आंखें देखती हैं “सामान्य”पर दिमाग समझ नहीं पाता सच्चाई!


प्रस्तुति-ज्योतिर्मय यादव

क्या आपने कभी कोई ऐसा चेहरा देखा जो पहली नज़र में बिल्कुल सामान्य लगे — लेकिन जैसे ही उसे सीधा घुमाया जाए, वो अचानक डरावना या अजीब दिखने लगे?यही है थैचर इफेक्ट — दिमाग को चकमा देने वाला एक कमाल का भ्रम!

👉 क्या होता है थैचर इफेक्ट?

इस इफेक्ट का नाम ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की एक एडिट की गई तस्वीर से पड़ा। उस तस्वीर में चेहरा उल्टा था, लेकिन आंखें और मुंह को सीधा कर दिया गया था।अब जब तस्वीर को उल्टा देखते हैं, तो सब कुछ सामान्य लगता है। लेकिन जैसे ही उसे सीधा करते हैं — चेहरा भयानक और अजीब दिखने लगता है!

👉 ऐसा क्यों होता है?

हमारा मस्तिष्क चेहरों को पहचानने में बेहद खास है।

यह चेहरे को समग्र रूप से (holistically) पहचानता है — मतलब आंख, नाक, होंठ सबको एक साथ, एक पैटर्न के रूप में देखता है।पर जब चेहरा उल्टा हो जाता है, तो यह सिस्टम काम नहीं करता।दिमाग को समझ नहीं आता कि आंखें और मुंह गलत दिशा में हैं, क्योंकि वह उल्टे चेहरे को वैसे “डिकोड” नहीं कर पाता जैसे सीधे को करता है।

👉 असल में यह दिमाग की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी चालाकी है।हमारा मस्तिष्क इस तरह विकसित हुआ है कि वो सीधे चेहरे देखकर भावनाएं और इरादे तुरंत समझ सके —

क्योंकि इंसानों के बीच संवाद, भरोसा और सुरक्षा सब चेहरे के हाव-भाव पर निर्भर हैं।पर जब चेहरा उल्टा होता है, तो यह स्वाभाविक प्रोसेसिंग टूट जाती है।

👉 क्या सिखाता है यह भ्रम?

थैचर इफेक्ट हमें यह बताता है कि —

हमारी आंखें तो सब कुछ देखती हैं, लेकिन हमारा दिमाग फिल्टर करके वही समझता है, जो उसे “सामान्य” लगता है।यह दिखाता है कि इंसानी मस्तिष्क कितना शानदार है — और साथ ही कितना आसानी से धोखा खा सकता है!

🎙️ संक्षेप में:

थैचर इफेक्ट हमें यह अहसास कराता है कि देखने और समझने में बहुत फर्क है।कभी-कभी सच्चाई सामने होती है — पर दिमाग उसे तब तक नहीं देख पाता, जब तक उसे सही एंगल से न दिखाया जाए।

🧩 यह है हमारे दिमाग की सबसे दिलचस्प चाल — जो बताती है कि इंसान देखता सब है, समझता वही है जो उसका मस्तिष्क उसे दिखाता है!

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

नई खोज

 🕰️ बिना घड़ी के समय जान सकोगे अब!



 रिपोर्ट – ज्योतिर्मय यादव, लखनऊ


वैज्ञानिकों ने समय मापने का ऐसा अनोखा तरीका खोज निकाला है जिसमें किसी घड़ी, सुई या शुरुआत के बिंदु की ज़रूरत ही नहीं है। यह खोज क्वांटम भौतिकी की दुनिया से आई है — जहाँ परमाणु और इलेक्ट्रॉन सामान्य नियमों से अलग, बेहद सूक्ष्म और रहस्यमय ढंग से काम करते हैं।

स्वीडन की Uppsala University के वैज्ञानिकों ने यह दिखाया कि समय को मापने के लिए हम अब परमाणुओं के भीतर बनने वाले प्राकृतिक पैटर्न्स का उपयोग कर सकते हैं। यह तकनीक भविष्य में क्वांटम विज्ञान और सटीक मापन तकनीकों में क्रांति ला सकती है।


⚛️ क्वांटम दुनिया की नई घड़ी

परमाणु के भीतर मौजूद इलेक्ट्रॉन जब लेज़र किरणों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं, तो वे एक खास अवस्था में पहुँचते हैं जिसे राइडबर्ग स्टेट (Rydberg State) कहा जाता है।
इस अवस्था में इलेक्ट्रॉन एक निश्चित रास्ते पर नहीं चलते, बल्कि वे लहरों की तरह फैलते हैं और आपस में मिलकर जटिल तरंग पैटर्न (wave patterns) बनाते हैं।

इन पैटर्न्स को राइडबर्ग वेव पैकेट्स (Rydberg Wave Packets) कहा जाता है। जब ये तरंगें आपस में टकराती हैं, तो वे एक खास इंटरफेरेंस पैटर्न बनाती हैं — और यही पैटर्न समय की पहचान बन जाता है।


⏱️ कैसे मापा जाता है समय बिना घड़ी के

इस नई तकनीक में वैज्ञानिकों को किसी “शुरुआती बिंदु” की ज़रूरत नहीं होती।
वे सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनों द्वारा बनाए गए पैटर्न को देखकर ही यह बता सकते हैं कि वे समय के किस क्षण पर हैं।
हर पैटर्न एक अनोखे “फिंगरप्रिंट” की तरह काम करता है, जो बताता है कि यह पल कौन-सा है।

यह कुछ ऐसा है जैसे कोई गाना चल रहा हो और आप सिर्फ़ कुछ सुर सुनकर बता दें कि गाने का कौन-सा हिस्सा चल रहा है — बिना यह जाने कि गाना कब शुरू हुआ था।


🔬 प्रयोग और परिणाम

वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में हीलियम परमाणुओं को लेज़र पल्स से ऊर्जा दी और फिर उन परमाणुओं के अंदर बने तरंग पैटर्न्स को रिकॉर्ड किया।
उन्होंने पाया कि ये पैटर्न्स बिल्कुल वैसे ही बने, जैसे उनके क्वांटम सिद्धांत (theoretical models) में अनुमान लगाया गया था।

इससे साबित हुआ कि समय को इन पैटर्न्स के ज़रिए सटीक रूप से मापा जा सकता है — बिना किसी पारंपरिक घड़ी के।


💡 भविष्य के लिए क्या मायने हैं?

यह खोज खासतौर पर क्वांटम प्रयोगों में बहुत उपयोगी होगी, जहाँ घटनाएँ कुछ ट्रिलियनवें सेकंड में घटित होती हैं।
इतने छोटे समय को मापना पारंपरिक तरीकों से लगभग असंभव होता है।

यह तकनीक भविष्य में क्वांटम कंप्यूटरों, अति-सटीक वैज्ञानिक मापों, और नैनो टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में बड़ा बदलाव ला सकती है।


📚 स्रोत:

Berholts, Marta, et al. "Quantum watch and its intrinsic proof of accuracy."
Physical Review Research 4.4 (2022): 043041.

पेनकिलर कीड़ा

 

🪱 अब कीड़ा बनेगा पेनकिलर! — दर्द मिटाने की दिशा में विज्ञान की सबसे चौंकाने वाली खोज





Report – Jyotirmay Yadav, Lucknow 

The Journal of Immunology में अगस्त 2025 को प्रकाशित एक शोध पत्र ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।
वैज्ञानिकों ने खोज की है कि एक छोटा-सा परजीवी कीड़ा — Schistosoma mansoni — इंसान की दर्द महसूस करने की क्षमता को ही बंद कर सकता है।

यह कीड़ा, जो दूषित पानी में पाया जाता है और Schistosomiasis नाम की बीमारी फैलाता है, शरीर में घुसने के बाद अपने बचाव के लिए एक अनोखी चाल चलता है।
यह हमारे TRPV1+ न्यूरॉन्स — यानी दर्द का सिग्नल दिमाग तक पहुँचाने वाली नसें — को निष्क्रिय कर देता है।
नतीजा यह होता है कि इंसान को दर्द या जलन महसूस ही नहीं होती, जबकि कीड़ा शरीर में आराम से घूमता रहता है।


🧬 दर्द मिटाने की नई दिशा

अब वैज्ञानिकों ने इस “कीड़े की तरकीब” को चिकित्सा में इस्तेमाल करने की ठान ली है।
शोधकर्ता इस परजीवी द्वारा छोड़े गए प्राकृतिक दर्द-रोधी अणुओं (molecules) को अलग कर ऐसे नॉन-ओपिओइड पेनकिलर विकसित करने पर काम कर रहे हैं —
जो नशा नहीं करते, लत नहीं लगाते, और बिना साइड इफेक्ट्स के दर्द से राहत देते हैं।

अगर यह प्रयास सफल होता है, तो यह खोज चिकित्सा जगत में ओपिओइड्स का सुरक्षित विकल्प बन सकती है।
यानि दर्द मिटाने का भविष्य अब प्रकृति के एक छोटे से कीड़े के रहस्य में छिपा हो सकता है।


⚕️ संक्रमण से बचाव में भी नई उम्मीद

दिलचस्प बात यह है कि यही तंत्र संक्रमण रोकने में भी मददगार साबित हो सकता है।
अगर वैज्ञानिक TRPV1+ न्यूरॉन्स को पहले से सक्रिय करने का तरीका खोज लें, तो ऐसे परजीवी कीड़ों के लिए शरीर में प्रवेश करना लगभग असंभव हो जाएगा।

इस तरह यह शोध न केवल दर्द से राहत बल्कि संक्रमण नियंत्रण में भी क्रांति ला सकता है।


📖 शोध विवरण:

Inclan-Rico, Juan M., et al.
“TRPV1+ Neurons Promote Cutaneous Immunity Against Schistosoma mansoni.”
The Journal of Immunology, 7 August 2025.

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